Tuesday, January 29, 2019

परों को कभी छिलते नहीं देखा.....परवीन शाकिर

बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा 
इस ज़ख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा 

इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश
फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा 

यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं 
जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा 

काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितली 
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा 

किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर 
वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा
-परवीन शाकिर

9 comments:

  1. परवीन शाक़िर शेर कहते हुए अपना दिल निकाल देती हैं और हमारा दिल जीत लेती हैं.

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (30-01-2019) को "वक्त की गति" (चर्चा अंक-3232) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत ही लाजवाब गजल
    वाह!!!!

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  4. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन मजदूरों की आवाज़ को सादर नमन : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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