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Wednesday, April 3, 2019

दृग-व्योम से क्यों बरसा है.....भारती दास

कुछ तो बता ऐ मन
क्या है तेरी उलझन
दृग-व्योम से क्यों बरसा है
व्याकुल अश्रुकण, कुछ तो....
दूर अनंत है प्रीतम का घर
धीरे धीरे बढ़ तू चलकर
पथ में हो शूलों का वन
या दुर्गम हो क्षण, कुछ तो....
पल-पल मिटते पल-पल बनते
क्षण-क्षण मरते क्षण-क्षण जीते
कर ना तू क्रंदन,
कर सुंदर चिन्तन, कुछ तो....
जबतक है सांसों का उद्गम
जग अपना है सबसे बंधन
मांग ले अपनापन
स्वप्न में कर विचरण, कुछ तो....
-भारती दास

Thursday, December 21, 2017

पूस की रात.....भारती दास

कांपती हड्डियाँ ठिठुरते गात 
है निर्दय सी ये पूस की रात ....
घुटनों में शीश झुका बैठे है 
कातर स्वर से पुकार उठे है 
न जाने कब होगी प्रभात , है निर्दय ....
लाचार बहुत मजबूर ये जान
संघर्ष में जीते हैं इन्सान
कुदरत देती है कठोर सी घात , है निर्दय ....
बर्फ सी बहती ठंढी बयार 
आग की लपटें है अंगीकार
निष्प्रभ लोचन बंधे है हाथ , है निर्दय ....
सभ्यता के इस दंगल में 
अंतर करना है मुश्किल में 
होकर मौन जीते चुपचाप , है निर्दय ....

-भारती दास