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Wednesday, June 12, 2019

क़रार मर के मिलेगा तो मर के देखते हैं.......हुमैरा राहत

मिसाल-ए-ख़ाक कहीं पर बिखर के देखते हैं 
क़रार मर के मिलेगा तो मर के देखते हैं 

सुना है ख़्वाब मुकम्मल कभी नहीं होते 
सुना है इश्क़ ख़ता है सो कर के देखते हैं 

किसी की आँख में ढल जाता है हमारा अक्स 
जब आईने में कभी बन सँवर के देखते हैं 

हमारे इश्क़ की मीरास है बस एक ही ख़्वाब 
तो आओ हम उसे ताबीर कर के देखते हैं 

सिवाए खाक के कुछ भी नज़र नहीं आता 
ज़मीं पे जब भी सितारे उतर के देखते हैं 

यह हुक्म है कि ज़मीन-ए-'फ़राज़' मैं लिखें 
सो इस मिसाल-ए-ख़ाक कहीं पर बिखर के देखते हैं 
-हुमैरा राहत

Tuesday, October 10, 2017

तीन लघु नज़्म....हुमैरा राहत


 तेरा नाम
 बारिशों के मौसम में 
 छत पे' बैठ के तन्हा 
 नन्ही नन्ही बूंदों से 
 तेरा नाम लिखती हूँ 

 काश 
मेरे मालिक 
बहुत रहमो-करम 
मुझ पर किये तूने 
मैं तेरा शुक्र अदा करते नहीं थकती 
मगर, बस एक छोटी सी शिकायत है
कि मेरी ज़िन्दगी में 
इतने सारे 'काश' 
क्यों रक्खे 

सवाल 
मुहब्बत आशना लम्हे (प्रेम पूर्ण क्षण ) 
छिपाये इक अजब सा कर्ब (वेदना ) 
लहज़े में मुझी से पूछते हैं 
ये अगर हर ख़्वाब की किस्मत में 
मर जाना ही लिखा है 
तो आँखें देखती क्यों हैं 
-हुमैरा राहत