Tuesday, June 25, 2019

समझौतों की कोई जु़बान नहीं होती...सीमा सिंघल सदा


तल्‍लीन चेहरों का सच 
कभी पढ़कर देखना 
कितने ही घुमावदार रास्‍तों पर 
होता हुआ यह 
सरपट दौड़ता है मन 
हैरान रह जाती हूँ कई बार 
इस रफ्त़ार से
 .... 

अच्‍छा लगता है शांत दिखना 
पर कितना मुश्किल होता है 
भीतर से शांत होना 
उतनी ही उथल-पुथल 
उतनी ही भागमभाग 
जितनी हम 
किसी व्‍यस्‍त ट्रैफि़क के 
बीच खुद को खड़ा पाते हैं . 
समझौतों की कोई जु़बान नहीं होती 
फिर भी वे हल कर लेते 
हर मुश्किल को !!!
लेखक परिचय - सीमा सिंघल सदा 

Monday, June 24, 2019

मुहब्बत का श्री गणेश.....नवीन मणि त्रिपाठी

2122 2122 212

हुस्न का बेहतर नज़ारा चाहिए ।
कुछ तो जीने का सहारा चाहिए ।।

हो मुहब्बत का यहां पर श्री गणेश ।
आप का बस इक इशारा चाहिए ।।

हैं टिके रिश्ते सभी दौलत पे जब ।
आपको भी क्या गुजारा चाहिए ।।

है किसी तूफ़ान की आहट यहां ।
कश्तियों को अब किनारा चाहिए ।।

चाँद कायम रह सके जलवा तेरा ।
आसमा में हर सितारा चाहिए ।।

फर्ज उनका है तुम्हें वो काम दें ।
वोट जिनको भी तुम्हारा चाहिए ।।

अब न लॉलीपॉप की चर्चा करें ।
सिर्फ हमको हक़ हमारा चाहिए ।।

कब तलक लुटता रहे इंसान यह ।
अब तरक्की वाली धारा चाहिए ।।

जात मजहब।से जरा ऊपर उठो ।
हर जुबाँ पर ये ही नारा चाहिए ।।

अम्न को घर में जला देगा कोई ।
नफरतों का इक शरारा चाहिए ।।
- नवीन मणि त्रिपाठी
शब्दार्थ - शरारा - चिंगारी 


Sunday, June 23, 2019

पास बैठो तुम...रश्मि शर्मा


आओ न

पास बैठो तुम
तुम्‍हारे मौन में
मैं वो शब्‍द सुनूंगी
जो जुबां कहती नहीं
दि‍ल कहता है तुम्‍हारा....

आओ न

फि‍र कभी मेरे इंतजार में
तुम तन्‍हा उदास बैठो
और दूर खड़ी होकर
मैं तुम्‍हारी बेचैनी देखूंगी...

आओ न...

मि‍ल जाओ कभी
राहों में बाहें फैलाए
मैं नि‍कल जाऊँगी कतराकर मगर
खुद को उनमें समाया देखूंगी......

आओ न...

फि‍र से अजनबी बनकर
मेरा रास्‍ता रोको..मुझसे बात करो
मुझे लेकर दूर कहीं नि‍कल जाओ
वादा है मेरा, झपकने न दूंगी पलकें
बस, तुममें ही डूबकर जिंदगी बसर करूंगी......।

Saturday, June 22, 2019

ज़िंदगी और मौत ....इन्द्रा

मौत ने पूछा
ज़िंदगी एक छलावा है
एक झूठ है
हर दिन हर पल तुम्हारा साथ छोड़ती जाती है
फिर भी तुम उसे प्यार करते हो
मैं एक सच्चाई हूँ अंत तक तुम्हारा साथ निभाती हूँ
पर फिर भी तुम मुझसे नफरत करते हो
मुझसे डरते हो
मुझसे समझौता कर लो
फिर कोई डर तुम्हें डरा न पायेगा
मैंने कहा
तुम सत्य हो शाश्वत हो
अनिवार्य हो
पर तुमसे कैसे समझौता करलूं
तुम्हारी टाइमिंग बहुत गलत होती है
तुम गलत समय पर गलत लोगों को ले जाती हो
तुम गलत समय पर गलत तरीके से आती हो
पूछो उन बदनसीब अभिवावकों से
जिन्होंने खोय अपने लाल असमय
पूछो उन से ,
जिन्होंने ने गवाए अपने परिजन
आतंकवादियों के हाथों
उम्र थी जान गवाने की
फिर जो मजबूर, पीड़ित , बीमार
मरने की प्रार्थना करते हैं
उन्हें तुम तड़पने को छोड़ देती हो
बच्चों ,जवानों को अपना शिकार बनाती हो
कैसे करलूं तुमसे समझौता
तुम कड़वा सच हो, अनिवार्य हो पर
न्यायसंगत नहीं
काम से काम मेरी नज़र में तो नहीं
ज़िन्दगी लाख छलावा सही
मीठा झूठ सही
पर सुन्दर है जीने का,
लड़ने का हौसला देती है

-इन्द्रा


Friday, June 21, 2019

ज़माने का चलन .....डॉ. ऋचा सत्यार्थी

हर दिशा में लम्हा-लम्हा बो गया है
कह के हमसे अलविदा वह जो गया है

कर लिए सूरज से समझौते घटा ने
उजली सुबह का वादा सो गया है

इस शहर में ख़ुशनुमा है आज मौसम
यह समां रंगीन, लेकिन, खो गया है

था किनारे का हंसी मंज़र छलावा
गम के सागर में डुबो हमको गया है

दुश्मनों से प्यार, नफ़रत दोस्तों से
यह ज़माने का चलन हो गया है

-डॉ. ऋचा सत्यार्थी

Thursday, June 20, 2019

कुछ शेर हवाओं के नाम …मंजू मिश्रा

हवाओं की..  कोई सरहद नहीं होती
ये तो सबकी हैं बेलौस बहा करती हैं
**
हवाएँ हैं, ये कब किसी से डरती हैं
जहाँ भी चाहें बेख़ौफ़ चला करती हैं
**
चाहो तो कोशिश कर के देख लो मगर
बड़ी ज़िद्दी हैं कहाँ किसी की सुनती हैं
**
हवाएँ न हों तो क़ायनात चल नहीं सकती 
इन्ही की इनायत है कि जिंदगी धड़कती है 
- मंजू मिश्रा
बेलौस - निस्वार्थ, बिना किसी भेदभाव के

Wednesday, June 19, 2019

जीवन बड़ा रचनाकार है ....राहुलदेव गौतम

जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
असत्य के शब्दों से,
सत्य का अर्थ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो कभी शाश्वत हुआ न हो,
ऐसे कल्पनाओं का भरमार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो बिखरा हुआ है,
ख़ुद ज़िम्मेदारियों के शृंखला में,
वो टूटे हुए सपनों का हार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

फँस जाते है स्वयं इसमें,
लक्ष्यों का अरमान,
ऐसे जालों का जंजाल रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

ख़ुद में खो जाता है,
ख़ुद में पा जाता है,
ऐसे इच्छाओं का संसार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जिससे मतलब की बात निकले,
जितना जिससे परिहास निकले,
ऐसे शख़्सों का अम्बार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

पल में रूप,
पल स्वरूप,
ऐसे सच-झूठ का नक़ाब बुनता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जितना घावों में ठीक लगे,
उतना ही गुनगुना लेता है,
ऐसे ही नग़मों की आवाज़ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
-राहुलदेव गौतम

Tuesday, June 18, 2019

क़लम, काग़ज़, स्याही और तुम .....हरिपाल सिंह रावत

उकेर लूँ, काग़ज़ पर,
जो तू आए, 
ख़्वाबों में ए ख़्याल ।
बस...
क़लम, काग़ज़, स्याही...
और तुम,
मैं बह जाऊँ... भावों में, 
अहा!
जो तू‌ आये...

भाव... 
रचना की आत्मा से मिल,
बुन आयें, पश्मीनी... 
ख़्वाबों का स्वेटर,
ओढ़ता फिरूँ जिसे, 
दर्द की सर्द सहर में,
जो दे जाए सर्द में गरमाहट... 
दर्द में राहत, 
अहा!

क़लम, काग़ज़, स्याही और तुम

जो तू आए, 
ख़्वाबों में ए ख़्याल ।
-हरिपाल सिंह रावत

Monday, June 17, 2019

इंसानियत का आत्मकथ्य .........अनुपमा पाठक

गुज़रती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आए
कितने ही दलदल
पर झेल सब कुछ
अब तक अड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

अट्टालिकाएँ करें अट्टहास
गर्वित उनका हर उच्छ्वास
अनजान इस बात से कि
नींव बन पड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

देख नहीं पाते तुम
दामन छुड़ा हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे बिसार दूँ
इंसानियत की कड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

जब-जब हारा तुम्हारा विवेक
आए राह में रोड़े अनेक
तब-तब कोमल एहसास बन
परिस्थितियों से लड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

भूलते हो जब राह तुम
घेर लेते हैं जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

मैं नहीं खोई, खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो इंसानियत हो तुममें मौज़ूद
फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा
प्रभु-प्रदत्त नेमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !
-अनुपमा पाठक
जमशेदपुर, झारखण्ड

Sunday, June 16, 2019

ये घट छलकता ही रहेगा ......निधि सक्सेना

मेरी ही करुणा पर
टिकी है ये सृष्टि ..
मेरे ही स्नेह से 
उन्मुक्त होते हैं नक्षत्र..
मेरे ही प्रेम से
आनंद प्रस्फुटित होता है ..
मेरे ही सौंदर्य पर 
डोलता है लालित्य ..
और मेरे ही विनय पर 
टिका है दंभ..

कि प्रेम स्नेह और करुणा का अक्षय पात्र हूँ मैं 
जितना उलीच लो 
ये घट छलकता ही रहेगा ..
-निधि सक्सेना

Saturday, June 15, 2019

घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में - यशु जान

पढ़ने में मज़ा तो है आता इन छाओं में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में 

पहली अशुद्धि सच लिखना, 
है दूसरी इनका ना बिकना, 
चोर ना छिप सकता है इनके गांव में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में 

तीसरी अशुद्धि चुभते शब्द, 
इनमें सब कुछ है उपलब्ध, 
जो होना चाहिए देश के इन युवाओं में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में 

और पांचवीं इनमें देश-भक्ति, 
छटी तेरे गुरुदेव की शक्ति, 
छिपा बहुत कुछ है इनकी अदाओं में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में 

सातवीं इनका जोश दिखाना, 
आठवीं सच पर मर मिट जाना, 
यशु जान तू मरेगा सब खताओं में, 
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में, 
पढ़ने में मज़ा तो है आता इन छाओं में - 
-यशु जान
यशु जान एक पंजाबी कवि और लेखक हैं। वे जालंधर शहर के रहने वाले हैं। उन्हें बचपन से ही कला से प्यार है। आप गीत, कविता और ग़ज़ल विधा में लिखते है | आपकी एक पुस्तक 'उत्तम ग़ज़लें और कविताएं' नाम से प्रकाशित हो चुकी है | फिलहाल आप जे. आर. डी. एम. कंपनी में बतौर स्टेट हैड बतौर काम कर रहे हैं |

Friday, June 14, 2019

सिखाया गया बहना धीरे धीरे ....निधि सक्सेना

बचपन से ही मुझे पढ़ाये गए थे संस्कार
याद कराई गईं मर्यादाएँ
हदों की पहचान कराई गई 
सिखाया गया बहना
धीरे धीरे 
अपने किनारों के बीच
तटों को बचाते हुए..
मन की लहरों को संयमित रख कर 
दायित्व ओढ़ कर बहना था 
आवेग की अनुमति न थी मुझे
अधीर न होना था 
हर हाल शांत रहना था ..

उमड़ना घुमड़ना नहीं था 
धाराएँ नहीं बदलनी थीं 
हर मौसम ख़ुद को संयमित रखना
मुझसे किनारे नहीं टूटने थे
मुझसे भूखंड नहीं टूटने थे 
मुझसे भूतल नहीं टूटने थे

कि मैं तो टूट कर प्रेम भी न कर पाई..
-निधि सक्सेना

Thursday, June 13, 2019

गूंजती है आवाज कानों में मेरी.... पूनम सिन्हा


रद़ीफ - है मुझे
क़ाफ़िया - ता(आ)

बड़ी सिद्दत से कोई चाहता है मुझे,
मुझसे भी अधिक वो जानता है मुझे।

गूंजती है आवाज कानों में मेरी,
दूर पहाड़ों से कोई पुकारता है मुझे।

मंदिरों में भी घंटे बजाता है हरदम,
जाके रब से सदा माँगता है मुझे।

खुली खिड़कियां जो कभी मेरे घर की,
छुप के पेड़ों से फिर झांकता है मुझे।

प्यार करता हूँ मैं सदियों से तुझे,
अपनी हरकतों से ये जताता है मुझे।

बड़ा मजबूर हूँ मैं, गमों से चूर हूँ मैं,
बहते हुए अश्कों से ये बताता है मुझे।

तड़प उठती हूँ मैं जब भी देखूँ उसे,
क्या है रिश्ता उससे जो सताता है मुझे।

स्वरचित,
-पूनम सिन्हा,
धनबाद,झारखंड।

Wednesday, June 12, 2019

क़रार मर के मिलेगा तो मर के देखते हैं.......हुमैरा राहत

मिसाल-ए-ख़ाक कहीं पर बिखर के देखते हैं 
क़रार मर के मिलेगा तो मर के देखते हैं 

सुना है ख़्वाब मुकम्मल कभी नहीं होते 
सुना है इश्क़ ख़ता है सो कर के देखते हैं 

किसी की आँख में ढल जाता है हमारा अक्स 
जब आईने में कभी बन सँवर के देखते हैं 

हमारे इश्क़ की मीरास है बस एक ही ख़्वाब 
तो आओ हम उसे ताबीर कर के देखते हैं 

सिवाए खाक के कुछ भी नज़र नहीं आता 
ज़मीं पे जब भी सितारे उतर के देखते हैं 

यह हुक्म है कि ज़मीन-ए-'फ़राज़' मैं लिखें 
सो इस मिसाल-ए-ख़ाक कहीं पर बिखर के देखते हैं 
-हुमैरा राहत

Tuesday, June 11, 2019

मानो रात से रोशनी टूटी हो ...निधि सक्सेना

स्त्री सुख की खोज में
और प्रेम की चाह में
मरीचिका की मृगी की तरह भागती रहती है 
पिता के घर से पति के घर
पति के घर से बेटे के घर ..
पुनः पुनः लौटने को ..

हर जगह से बटोरती हैं क़िस्से 
जिन्हें याद कर अतीत में झाँकती रहती है..

न जाने क्यों 
हर वर्तमान अतीत से ज़्यादा बेबस मालूम होता है 
अतीत से ज़्यादा ख़ाली ..

न जाने क्यों 
हर बार प्रेम और सुख की चाह यूँ टूटती है
मानो रात से रोशनी टूटी हो ...
-निधि सक्सेना

Monday, June 10, 2019

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है ..... दुष्यंत कुमार

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।
-दुष्यंत कुमार

Sunday, June 9, 2019

व्हाट्सएप भी कभी-कभी मार्के की टिप्स देता है...

मेरी माँ का ब्लड प्रेशर और शुगर बढ़ा हुआ था, सो सवेरे सवेरे उन्हें लेकर उनके पुराने डॉक्टर के पास गई, क्लिनिक से बाहर उनके गार्डन का नज़ारा दिख रहा था जहां डॉक्टर साहब योग और व्यायाम कर रहे थे मुझे करीब 45 मिनिट इंतज़ार करना पड़ा।

कुछ देर में डॉक्टर साहब अपना नींबू पानी लेकर क्लिनिक आये और माँ का चेकअप करने लगे। उन्होंने मम्मी से कहा आपकी दवाइयां बढ़ानी पड़ेंगी और एक पर्चे पर करीब 5 या 6 दवाइयों के नाम लिखे। उन्होंने माँ को दवाइयां रेगुलर रूप से खाने की हिदायत दी। बाद में मैंने उत्सुकता वश उनसे पूछा कि क्या आप बहुत समय से योग कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि पिछले 15 साल से वो योग कर रहे हैं और ब्लड प्रेशर व अन्य बहुत सी बीमारियों से बचे हुए हैं!

मैं अपने हाथ मे लिए हुए माँ के उस पर्चे को देख रही थी जिसमे उन्होंने BP और शुगर कम करने की कई दवाइयां लिख रखी थी?
🤔
सर में भयंकर दर्द था सो अपने परिचित केमिस्ट की दुकान से सर दर्द की गोली लेने रुकी। दुकान पर नौकर था ,उसने मुझे गोली का पत्ता दिया तो उससे मैंने पूछा गोयल साहब कहाँ गए हैं, तो उसने कहा साहब के सर में दर्द था सो सामने वाले कैफ़े में काफी पीने गये हैं अभी आते होंगे!!
मैं अपने हाथ मे लिए उस दवाई के पत्ते को देख रही थी?

🤔🤔
अपनी मित्र के साथ एक ब्यूटी पार्लर गई। मेरी सहेली को हेयर ट्रीटमेंट कराना था क्योंकी उनके बाल काफी खराब हो रहे थे। रिसेप्शन में बैठी लड़की ने उन्हें कई पैकेज बताये और उनके फायदे भी। पैकेज 1200 से लेकर 3000 तक थे कुछ डिस्काउंट के बाद मेरी मित्र को उन्होंने 3000 रु वाला पैकेज 2400रु  में कर दिया। हेयर ट्रीटमेंट के समय उनका ट्रीटमेंट करने वाली लड़की के बालों से अजीब सी खुशबू आ रही थी मैंने उससे पूछा कि आपने क्या लगा रखा है कुछ अजीब सी खुशबू आ रही है, तो उसने कहा उसने तेल में मेथी और कपूर मिला कर लगा रखा है इससे बाल सॉफ्ट हो जाते हैं और जल्दी बढ़ते हैं।
मैं अपनी मित्र की शक्ल देख रही थी जो 2400 रु में अपने बाल अच्छे कराने आई थी
🤔🤔🤔

मेरी रईस कज़िन जिनका  बड़ा डेयरी फार्म है उनके फार्म पर गई ।फार्म में करीब 150 विदेशी गाय थी जिनका दूध मशीनों  द्वारा निकाल कर प्रोसेस किया जा रहा था। एक अलग हिस्से में 2 देसी गैया हरा चारा खा रही थी। पूछने पर बताया घर उन गायों का दूध नही आता जिनका दुध उनके डेयरी फार्म से सप्लाई होता है बल्कि परिवार के इस्तेमाल के लिए इन 2 गायों का दूध,दही  व घी इस्लेमाल होता है।

मै उन लोगों के बारे में सोच रही थी जो ब्रांडेड दूध को बेस्ट मानकर खरीदते हैं
🤔🤔🤔🤔

एक प्रसिद्ध रेस्टोरेंट जो कि अपनी विशिष्ट थाली और शुद्ध खाने के लिए प्रसिद्ध है हम खाना खाने गये।
निकलते वक्त वहां के मैनेजर ने बड़ी  विनम्रता से पूछा मैडम खाना कैसा लगा,हम बिल्कुल शुद्ध घी तेल और मसाले यूज़ करते हैं, हम कोशिश करते हैं बिल्कुल घर जैसा खाना लगे।
 मैंने खाने की तारीफ़ की तो उन्होंने अपना विजिटिंग कार्ड देने को अपने केबिन में गये। काउंटर पर एक 3 खण्ड का स्टील का टिफिन रखा था।  एक वेटर ने दूसरे से कहा"सुनील सर का खाना अंदर केबिन में रख दे ,बाद में खाएंगे" मैंने वेटर से पूछा क्या सुनील जी यहां नही खाते तो उसने जवाब दिया" सुनील सर कभी बाहर नही खाते, हमेशा घर से आया हुआ खाना ही खाते हैं"

मैं अपने हाथ मे 670 रु के बिल को देख रही थी
🤔🤔🤔🤔🤔

ये कुछ वाकये हैं जिनसे मुझे समझ आया कि हम जिसे सही जीवन शैली समझते हैं वो हमें भृमित करने का जरिया मात्र है। हम मार्केटिंग के बैंक  का ATM हैं जिसमें से कुशल मार्केटिंग वाले लोग मोटा पैसा निकाल लेते हैं।

अक्सर जिन चीजों को हमे बेचा जाता है उन्हें बेचने वाले खुद इस्तेमाल नही करते है
मार्केटिग टिप्स

Saturday, June 8, 2019

बेटियाँ........उषा किरण




बेटियां होती हैं कितनी प्यारी
कुछ कच्ची
कुछ पक्की
कुछ तीखी
कुछ मीठी
पहली बारिश से उठती
सोंधी सी महक सी
दूर क्षितिज पर उगते
सतरंगी वलय सी
आंखों में झिलमिलाते तारे
पैरों में तरंगित लहरें
उड़ती फिरती हैं तितली सी
बरसती हैं बदली सी
फिर एक दिन-
आँचल में सूरज-चॉंद
ऑंगन की धूप छॉंव लेकर
कोमल सी पलकों से रचातीं
सुर्ख बेल-बूटे
फिर उजले से आंगन में
रोपती हैं जाकर
बड़े चाव से
कुछ अंकुरित बीज
समर्पण के
संस्कार के
ममता के
दुलार के
और बेटियां इस तरह
रचती हैं
क्षितिज के अरुणाभ भाल पर
आगाज
एक नन्हीं सुबह का !!!

लेखक परिचय -  उषा किरण

Friday, June 7, 2019

ख़त ....अनिल खन्ना


बरसों पहले 
बिछुड़ते वक़्त 
तुमने जो ख़त 
मुझे दिया था 
उसमे अब 
झुरीयाँ सी 
पड़ने लगी हैं, 
सियाही फीकी 
पड़ने लगी है।


अश्कों में 
डूबते-तैरते अल्फ़ाज़ 
अब बेजान से 
लगने लगे हैं , 
अपनी कशिश 
खोने लगे हैं ।
ख़त का रंग 
पीला पड़ने लगा है  
कहीं-कहीं से 
छितरने लगा है, 
सच कहुँ तो 
मुझ जैसा 
लगने लगा है।


बंद अलमारी मे रखी 
कमीज़ों की तह मे 
क़ैद हो कर 
बची हुई ज़िन्दगी 
जी रहा है ।
मेरी तरह ।
-अनिल खन्ना

Thursday, June 6, 2019

स्त्री की दास्तां...डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

मैं पानी हूँ..
तरल,स्वच्छ और नरम
ओ समय! तुम यदि पत्थर भी हो
तो कोई बात नहीं
चलती रहूँगी प्यार से
तुम्हारी कठोर सतह पर
धार बनकर
एक दिन तुम्हारी कठोर सतह
पर केवल मेरे निशान होंगे
और होगी कभी न थकने वाली
स्त्री की दास्तां...
डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'