Friday, November 15, 2019

मैं पहले ही राख हूँ जलता नहीं हूँ ....अमित मिश्रा 'मौन'

मैं गुलों के जैसा महकता नहीं हूँ।
सितारा हूँ लेकिन चमकता नहीं हूँ।।

ज़माना ये समझे कि खोटा हूँ सिक्का,
बाज़ारों में इनकी मैं चलता नहीं हूँ।

यूँ  तो अंधेरों से जिगरी है यारी,
मैं ऐसा हूँ सूरज कि ढलता नहीं हूँ।

सफ़र पे जो निकला तो मंज़िल ज़रूरी,
यूँ राहों में ऐसे  मैं रुकता नहीं  हूँ।

उम्मीद-ए-वफ़ा  ने है तोड़ा  मुझे भी,
मैं आशिक़ के जैसा तड़पता नहीं हूँ।

कोशिश में ज़ालिम की कमी नहीं थी,
मैं पहले ही राख हूँ जलता नहीं  हूँ।

मयखानों की रौनक है शायद मुझी से,
मैं कितना भी पी लूँ बहकता नहीं हूँ।

सूरत से ज़्यादा  मैं  सीरत  को चाहूँ,
रुख़सारों पे चिकने फिसलता नहीं हूँ।

मुसीबत से अक़्सर कुश्ती हूँ करता,
है लोहा बदन मेरा थकता नहीं हूँ।

मिट्टी का बना हूँ ज़मीं से जुड़ा हूँ,
खुले आसमानों में उड़ता नहीं हूँ।

हुनर पार करने का सीखा है मैंने,
बीच भँवर अब मैं फंसता नहीं हूँ।

'मौन' भला  हूँ ना छेड़ो मुझे तुम,
मैं यूँ ही किसी के मुँह लगता नहीं हूँ।
- अमित मिश्रा 'मौन'

Thursday, November 14, 2019

एक बार पा तो लूँ, उसे ....रत्ना सिन्हा

मंज़िलों को पाने का मज़ा भी तभी है
जब तक वो ना मिले;
मिल जाये वो अगर तो लगता है
जैसे ख़्वाब कोई हक़ीक़त बन गए।
और, ना मिले वो अगर तो लगता है
जैसे ज़मीन-आसमां सब इक कर दूँ।
चाँद-सितारे भी तोड़ डालूँ, पर
एक बार पा तो लूँ, उसे।

चाहे जैसा भी हो वो, हर उपाए कर लूँ,
मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरूद्वारे के चक्कर भी ,
चाहे जितनी बार हो सके लगा लूँ।
पंडित-ज्योतिष-फ़क़ीर ने तो, न जाने
कितनी बार हाथों की लकीरें भी पढ़ी हो;
उसे पाने की चाह इतनी प्रबल हो जाती
कुछ भी कर गुज़रने को जी चाहता, बस
एक बार पा तो लूँ, उसे।

उसे पाने की कोई कसर बाकी न रह जाए,
ऐसी चाहत मात्र से ही हिम्मत और हौसले भी
सिर चढ़ कर बोलने लग जाते हैं जब,
तुन्हें न पाने की भी कोई गुंजाइश ही नहीं तब
हर वो मुसीबत मोल ली, बस
एक बार उसे पाने की जिद्द् ने
फिर, कितने जंग लड़े हो जैसे
पाकर मंज़िल भी धन्य हो गए वैसे!
-रत्ना सिन्हा

Wednesday, November 13, 2019

नर्म आहट खुशबुओं की ....कुमार रवीन्द्र

आज फिर
इन सीढियों पर
नर्म आहट खुशबुओं की

दबे पाँवों धूप लौटी
और कमरे में घुसी
उँगलियाँ पकड़े हवा की
चढ़ी छज्जे पर ख़ुशी

बात फिर
होने लगी है
फुसफुसाहट खुशबुओं की

एक नीली छाँव
दिन भर
खिड़कियाँ छूने लगी
आँख-मींचे देखती रितु
ढाई आखर की ठगी

तितलियाँ
दालान भर में
है बुलाहट खुशबुओं की
1940-2019

-कुमार रवीन्द्र



Tuesday, November 12, 2019

आहट जो तुमसे होकर मुझ तक आती है ...स्मृति आदित्य


रिश्तों की बारीक-बारीक तहें
सुलझाते हुए
उलझ-सी गई हूं,
रत्ती-रत्ती देकर भी
लगता है जैसे
कुछ भी तो नहीं दिया,
हर्फ-हर्फ
तुम्हें जानने-सुनने के बाद भी
लगता है
जैसे अजनबी हो तुम अब भी,

हर आहट
जो तुमसे होकर
मुझ तक आती है
भावनाओं का अथाह समंदर
मुझमें आलोड़‍ित कर
तन्हा कर जाती है।

एक साथ आशा से भरा,
एक हाथ विश्वास में पगा और
एक रिश्ता सच पर रचा,

बस इतना ही तो चाहता है
मेरा आकुल मन,
दो मुझे बस इतना अपनापन...
बदले में
लो मुझसे मेरा सर्वस्व-समर्पण....
-स्मृति आदित्य 'फाल्गुनी'
वेब दुनिया से


Monday, November 11, 2019

मुक्त रखने का वादा है मेरा ...निधि सक्सेना

एक समय वो भी रहा
जब हर चीज़ कस कर पकड़ने की आदत थी
चाहे अनुभूतियाँ हों
पल हों
रिश्ते हों
या कोई मर्तबान ही
मुट्ठियाँ भिंची रहती

जब स्थितियाँ बदलतीं
और चीज़े हाथ से फिसलती
तो नाखूनों में रह जाती किरचनें
स्मृतियों की
लांछनों की
छटपटाहटों की
कांच की

अजीब सा दंश था
कि मैं दिन भर नाखून साफ करती
और रात भर किरचनों की गर्त मझे खरोंचती
वक्त उन्ही किरचनों में भटकता रहता
मैं बेबसी और कुंठा से भरती जाती

परंतु अब सीख लिया है
चीज़ों को हल्के हाथ से पकड़ना
वक्त को मुक्त रखना
जाती हुई चीज़ो को विसर्जित कर देना

नाखूनों में कोई किरचन गर रह गई हो
तो बगैर गौर किये
भूलते जाना भुलाते जाना

कि ऐ जिन्दगी
उम्मीद का सेहरा बाँध कर आना
तुझे बीते वक्त की हर किरचन से 
मुक्त रखने का वादा है मेरा.
-निधि सक्सेना

Sunday, November 10, 2019

मुखौटे बदल के देखते हैं ...नवीन मणि त्रिपाठी


1212 1122 1212 22/112
न पूछिये कि वो कितना सँभल के देखते हैं ।
शरीफ़ लोग मुखौटे बदल के देखते हैं ।।

अज़ीब तिश्नगी है अब खुदा ही खैर करे ।
नियत से आप भी अक्सर फिसल के देखते हैं ।।

पहुँच रही है मुहब्बत की दास्ताँ उन तक ।
हर एक शेर जो मेरी ग़ज़ल के देखते हैं ।।

ज़नाब कुछ तो शरारत नज़र ये करती है ।
यूँ बेसबब ही नहीं वो मचल के देखते हैं ।।

गुलों का रंग इन्हें किस तरह मयस्सर हो ।
ये बागवान तो कलियां मसल के देखते हैं ।।

ज़मीर बेच के जिंदा मिले हैं लोग बहुत ।
तुम्हारे शह्र में जब भी टहल के देखते है ।।

न जाने क्या हुआ जो बेरुख़ी सलामत है ।
हम उनके दिल के जरा पास चल के देखते हैं ।।

ये इश्क़ क्या है बता देंगे तुझको परवाने ।
जो शम्मा के लिए हर शाम जल के देखते हैं ।।

हुआ है हक़ पे बहुत जोर का ये हंगामा ।
गरीब क्यूँ यहाँ सपने महल के देखते हैं ।।

बचाएं दिल को सियासत की साज़िशों से अब ।
ये लीडरान मुहब्बत कुचल के देखते हैं ।।

वही गए हैं बुलंदी तलक यहां यारो ।
जो अपने वक्त के सांचे में ढल के देखते हैं ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Saturday, November 9, 2019

अपना बना कर देखो ना ..निधि सक्सेना

ग़ैरों को अपना बनाने का हुनर है तुममें
कभी अपनो को अपना बना कर देखो ना..

ग़ैरों का मन जो घड़ी में परख लेते हो
कभी अपनो का मन टटोल कर देखो ना..

माना कि ग़ैरों संग हँसना मुस्कुराना आसां है
कभी मुश्किल काम भी करके देखो ना..

कामकाजी बातचीत ज़रूरी है ज़माने से
कभी अपनो संग ग़ैरज़रूरी गुफ़्तगू भी कर देखो ना ..

इतने मुश्किल नहीं जो अपने हैं
कभी मुस्कुरा कर हाथ बढ़ा कर देखो ना..
चित्र कविताकोश से
-निधि सक्सेना
फेसबुक से

Friday, November 8, 2019

स्पीड ब्रेकर ....श्वेता सिन्हा

सृष्टि से उत्पन्न
ब्रह्मांड के चर-अचर
समस्त जीव-निर्जीव
ग्रह-गोचर,नक्षत्र,उल्का,पिंड
जीवन,प्रकृति का सूक्ष्म से सूक्ष्म कण,
सभी अपनी निर्धारित
सीमाओं से बँधे
अपनी निश्चित परिधियों में 
घूमते
तट से वचनबद्ध
निरंतर अपने
कर्मपथ पर,
अपनी तय उम्र जीने को
विवश हैं
क्योंकि निर्धारित अनुशासन है
स्पीड ब्रेकर की तरह,
सीमाओं का उल्लंघन,
असमाऩ्य गतिशीलता,
असंतुलित बहाव
 और
धुरी से विलगता का परिणाम
भुगतना पड़ता है।
स्पीड ब्रेकर को अनदेखी
किये जाने की
लापरवाही से उपजी 
विनाशकारी
और जानलेवा हादसों की तरह।
-श्वेता सिन्हा

Thursday, November 7, 2019

तुम्हारी आँखें ...श्वेता सिन्हा

ठाठें मारता 
ज्वार से लबरेज़
नमकीन नहीं मीठा समुंदर
तुम्हारी आँखें

तुम्हारे चेहरे की
मासूम परछाई
मुझमें धड़कती है प्रतिक्षण
टपकती है सूखे मन पर
बूँद-बूँद समाती
एकटुक निहारती
तुम्हारी आँखें

नींद में भी चौंकाती
रह-रह कर परिक्रमा करती
मन के खोह,अबूझ कंदराओं,
चोर तहखानों का
स्वप्न के गलियारे में 
थामकर उंगली
अठखेलियाँ करती
देह पर उकेरती 
बारीक कलाकृत्तियाँ
तुम्हारी आँखें

बर्फ की छुअन-सी
तन को सिहराती
कभी धूप कभी चाँदनी
कभी बादल के नाव पर उतारती
दिन के उगने से रात के ढलने तक
दिशाओं के हर कोने से
एकटुक ताकती
मोरपंखी बन सहलाती
तुम्हारी आँखें....
-श्वेता सिन्हा


Wednesday, November 6, 2019

गीत प्यारे खो गए...रमेशराज तेवरीकार

प्यार के, इकरार के अंदाज सारे खो गए
वो इशारे, रंग सारे, गीत प्यारे खो गए।

ज़िन्दगी से, हर खुशी से, रोशनी से, दूर हम
इस सफर में, अब भँवर में, सब किनारे खो गए।

आप आए, मुस्कराए, खिलखिलाए, क्यों नहीं?
नित मिलन के, अब नयन के चाँद-तारे खो गए।

ज़िन्दगी-भर एक जलधर-सी इधर रहती खुशी
पर ग़मों में, इन तमों में सुख हमारे खो गए।

फूल खिलता, दिन निकलता, दर्द ढलता अब नहीं
हसरतों से, अब ख़तों से सब नज़ारे खो गए।

तीर दे, कुछ पीर दे, नित घाव की तासीर दे
पाँव को जंजीर दे, मन के सहारे खो गए।
-रमेशराज तेवरीकार

Tuesday, November 5, 2019

यादें जाती नहीं ...कुँवर रवीन्द्र

पूरी रात जागता रहा
सपने सजाता,
तुम आती थीं, जाती थीं
फिर आतीं फिर जातीं ,
परन्तु
यादें करवट लिए सो रही थीं

सुबह,
यादों ने ही मुझे झझकोरा
और जगाया,
जब मै जागा
यादें दूर खड़ी हो
घूर-घूर कर मुझे देखती
और मुस्कुरा रहीं थीं

मैंने कहा
चलो हटो ,
आज नई सुबह है
मै नई यादों के साथ रहूँगा

वे नज़दीक आईं
और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगीं

लाख जतन किए
वे गईं नहीं

यादें जाती नहीं
पूरे घर पर
कब्ज़ा कर बैठी हैं

यादें जो एक बार जुड़ जाती है
वे जाती नहीं
बस करवट लेकर
सो जाती हैं
- कुँवर रवीन्द्र
मूल रचना
कविताकोश

Monday, November 4, 2019

बस एक लम्हे का झगड़ा था ....गुलज़ार

बस एक लम्हे का झगड़ा था
दर-ओ-दीवार पे ऐसे छनाके से गिरी आवाज़
जैसे काँच गिरता है
हर एक शय में गई
उड़ती हुई, चलती हुई, किरचें
नज़र में, बात में, लहजे में,
सोच और साँस के अन्दर
लहू होना था इक रिश्ते का
सो वो हो गया उस दिन
उसी आवाज़ के टुकड़े उठा के फर्श से उस शब
किसी ने काट ली नब्जें
न की आवाज़ तक कुछ भी
कि कोई जाग न जाए
बस एक लम्हे का झगड़ा था
-गुलज़ार
मूल रचना
कविताकोश

Sunday, November 3, 2019

खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो? ....गुलज़ार

खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?
एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।

डाक से आया है तो कुछ कहा होगा
"कोई वादा नहीं... लेकिन
देखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!"

या कहा हो कि... "खाली हो चुकी हूँ मैं
अब तुम्हें देने को बचा क्या है?"

सामने रख के देखते हो जब
सर पे लहराता शाख का साया
हाथ हिलाता है जाने क्यों?
कह रहा हो शायद वो...
"धूप से उठके दूर छाँव में बैठो!"

सामने रौशनी के रख के देखो तो
सूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं

"इक ज़मीं दोज़ दरया, याद हो शायद
शहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!"

उसने भी वक्त के हवाले से
उसमें कोई इशारा रखा हो... या
उसने शायद तुम्हारा खत पाकर
सिर्फ इतना कहा कि, लाजवाब हूँ मैं!
-गुलज़ार
मूल रचना
कविताकोश से

Saturday, November 2, 2019

भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में ...कुंवर नारायण

प्लास्टिक के पेड़
नाइलॉन के फूल
रबर की चिड़ियाँ
टेप पर भूले बिसरे
लोकगीतों की
उदास लड़ियाँ.....

एक पेड़ जब सूखता
सब से पहले सूखते
उसके सब से कोमल हिस्से-
उसके फूल
उसकी पत्तियाँ ।

एक भाषा जब सूखती
शब्द खोने लगते अपना कवित्व
भावों की ताज़गी
विचारों की सत्यता –

बढ़ने लगते लोगों के बीच
अपरिचय के उजाड़ और खाइयाँ ......

सोच में हूँ कि सोच के प्रकरण में
किस तरह कुछ कहा जाय
कि सब का ध्यान उनकी ओर हो
जिनका ध्यान सब की ओर है –

कि भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में
आग यदि लगी तो पहले वहाँ लगेगी
जहाँ ठूँठ हो चुकी होंगी
अपनी ज़मीन से रस खींच सकनेवाली शक्तियाँ ।
-कुंवर नारायण

Friday, November 1, 2019

बहती जा ...सरिता सागर

दुःख - दर्द की इन लहरों के बीच
डूबती तैरती मैं
कुछ पल जीने की
कोशिश कर लेती हूँ
जीवन का मतलब ही बहना है
और फिर मैं तो सरिता हूँ

शिकायतों के पिटारे ना खोल
मुसीबतों के पहाड़ ना बना
दुख बयाँ ना कर
बस बहती जा

दर्द ना बांट किसी से
अपने ज़ख़्म ना दिखा
इन आहों को दबा
ये आँसू ना बहा
बस बहती जा .

-सरिता सागर

Thursday, October 31, 2019

लिख रहे हैं आप मानवता पर...यशोदा अग्रवाल

लिख रहे हैं आप
मानवता पर
लिखिए
जी चाहे
जितना हो
स्याही कलम में
खतम हो जाए 
तो और भर लो
कलम को सियाही से
सोचकर जितना
अच्छा लिखना हो
लिख डाले..और
करते रहो
प्रतीक्षा...
उसी मानवता की
जिसकी बाट आप
जोह रहे हैं
आनेवाली हर गाड़ी
देख लो...सब आएँगे
पर......मानवता
जिसकी तुम्हें प्रतीक्षा है
वो तो कबकी
निवाला बन चुकी है
आराम फरमा रही है
पेट में...
नेताओं और आतंकियों
के....पर
हजम नहीं हुई अब तक

लेखिका परिचय -यशोदा अग्रवाल 

Wednesday, October 30, 2019

समझ... ज़िन्दगी की .....अनामिका घटक

ज़िन्दगी जी लिया हमने 
गमों को पी लिया हमने 
होश में हम जब आये
दिल को सी लिया हमने 

मैखाना भी ख़ाली था 
पैमाना भी ख़ाली था 
भरी थी जिन आंखों में इश्क़ 
वो निगाहें बड़ा सवाली था 

कहा दिल का भी मान लो
अपने जज़्बातों को थाम लो 
न करो सरेआम जख़्मों को 
ज़रा समझदारी से काम लो 
-अनामिका घटक

Tuesday, October 29, 2019

दोपहर होने को आई..... गुलज़ार

आकाश इतना छोटा तो नही
और इतना थोड़ा भी नही .
सारी ज़मीन ढांप ली साहिब
मेरा इतना सा आँगन
क्यूँ नही ढांप ले सकता ..
दोपहर होने को आई
और इक आरज़ू
धूप से भरे आँगन में
छाँव के छीटे फेंकती है
और कहती है
ये आँगन मेरा नही ..
यहाँ तो बस
पाँव रखने को छाँव चाहिए मुझे ..
ये घर भी मेरा नही
मुझे उस घर जाना है
जिस घर मेरा आसमान रहता है .
मेरा आकाश बसता है !
-गुलज़ार
साभार
गुल-ए-गुलज़ार

Monday, October 28, 2019

रात चाँद और मैं ....गुलज़ार

उस रात बहुत सन्नाटा था
उस रात बहुत खामोशी थी
साया था कोई ना सरगोशी
आहट थी ना जुम्बिश थी कोई
आँख देर तलक उस रात मगर
बस इक मकान की दूसरी मंजिल पर
इक रोशन खिड़की और इक चाँद फलक पर
इक दूजे को टिकटिकी बांधे तकते रहे
रात  चाँद  और  मैं  तीनो  ही  बंजारे  हैं
तेरी  नाम  पलकों  में  शाम  किया  करते  हैं  
कुछ  ऐसी  एहतियात  से  निकला  है  चाँद  फिर
जैसे  अँधेरी  रात  में  खिड़की  पे  आओ   तुम  

क्या  चाँद  और  ज़मीन   में  भी  कोई  खिंचाव  है  
रात  चाँद  और  मैं  मिलते  हैं  तो  अक्सर  हम
तेरे  लेहज़े  में  बात  किया  करते  हैं 
  
सितारे  चाँद  की  कश्ती  में  रात  लाती  है   
सहर   में  आने  से  पहले  बिक  भी  जाते  हैं


बहुत  ही  अच्छा  है  व्यापार  इन  दिनों  शब  का  
बस  इक  पानी  की  आवाज़  लपलपाती   है
की  घात  छोड़  के  माझी   तमामा  जा   भी  चुके  हैं 


चलो  ना  चाँद  की  कश्ती  में  झील  पार  करें


रात  चाँद  और  मैं अक्सर  ठंडी  झीलों   को
डूब  कर  ठंडे  पानी  में  पार  किया  करते  हैं
-गुलज़ार
साभार
गुल-ए-गुलज़ार

Sunday, October 27, 2019

टांग पे टांग रख के चांद ...गुलज़ार

एक नज़्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी ने
यहीं पड़ी थी बालकनी में
गोल तिपाही के ऊपर थी
व्हिस्की वाले ग्लास के नीचे रखी थी
नज़्म के हल्के हल्के सिप मैं
घोल रहा था होठों में
शायद कोई फोन आया था
अन्दर जाकर लौटा तो फिर नज़्म वहां से गायब थी
अब्र के ऊपर नीचे देखा
सूट शफ़क़ की ज़ेब टटोली
झांक के देखा पार उफ़क़ के
कहीं नज़र ना आयी वो नज़्म मुझे
आधी रात आवाज़ सुनी तो उठ के देखा
टांग पे टांग रख के आकाश में
चांद तरन्नुम में पढ़ पढ़ के
दुनिया भर को अपनी कह के
नज़्म सुनाने बैठा था
-गुलज़ार

Saturday, October 26, 2019

लुटे न देश कहीं आज ...नवीन मणि त्रिपाठी

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लुटे न देश कहीं आज लंतरानी में ।
लगा रहे हैं मियां आग आप पानी में।।

खबर है सबको किधर जा रही है ये कश्ती ।
जनाब जीते रहें आप शादमानी में ।।

अजीब शोर है खामोशियों के बीच यहाँ ।
बहें हैं ख़्वाब भी दरिया के इस रवानी में ।।

सवाल जब से तरक़्क़ी पे उठ रहा यारो ।।
चुरा रहे हैं नज़र लोग राजधानी में ।।

लिखेगा जब भी कोई क़त्ल की सियासत को ।
तुम्हारा जिक्र तो आएगा हर कहानी में ।।

किसे है फिक्र यहां उनकी बदनसीबी की ।
कटोरे ले के जो निकले हैं इस जवानी में ।।

ऐ नौजवां तू जरा मांग हक़ की रोटी को ।
बहुत है जादू सुना उनकी मिह्रबानी में ।।

यकीन हम भी न करते अगर खबर होती ।
मिलेंगे ज़ख्म बहुत प्यार की निशानी में ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी