अपने सारे उसूलों को
तिजोरी में बंद कर
घर से खाली हाथ निकलता हूँ
और देखता हूँ कि अब मैं
भीड़ में अकेला नहीं हूँ,
अब मुझे
दुनियादारी का कुछ सामान
बाज़ार से खरीदना होगा
और अपने अंतर को
उससे सजाना होगा,
या फिर
भीड़ में अकेले चलने का
साहस जुटाना होगा !
