जलती-बुझती-सी रोशनी के परे
हमने एक रात ऐसे पाई थी
रूह को दांत से जिसने काटा था
जिस्म से प्यार करने आई थी
जिसकी भींची हुई हथेली से
सारे आतिश फशां उबल उट्ठे
जिसके होंठों की सुर्खी छूते ही
आग-सी तमाम जंगलों में लगी
आग माथे पे चुटकी भरके रखी
खून की ज्यों बिंदिया लगाई हो
......
किस कदर जवान थी,
कीमती थी..
महंगी थी..
वह रात..
हमने जो..
रात यूं ही पाई थी।
-मीना कुमारी

