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Saturday, October 14, 2017

मिट्टी के घरोंदे है, लहरों को भी आना है......मनोज सिंह”मन”

मिट्टी के घरोंदे है, लहरों को भी आना है,
ख्बाबों की बस्ती है, एक दिन उजड़ जाना है,

टूटी हुई कश्ती है, दरिया पे ठिकाना है,
उम्मीदों का सहारा है,इक दिन चले जाना है,

बदला हुआ वक़्त है, ज़ालिम ज़माना है,
यंहा मतलबी रिश्ते है, फिर भी निभाना है,

वो नाकाम मोहब्बत थी, अंजाम बताना है,
इन अश्कों को छुपाना है, गज़ले भी सुनाना है,

इस महफ़िल में सबको, अपना ही माना है,
“मन” कैसा है दोस्तों, ये आपको ही बताना है,