Showing posts with label इन्द्रा.वर्ड प्रेस. Show all posts
Showing posts with label इन्द्रा.वर्ड प्रेस. Show all posts

Thursday, August 22, 2019

सलाह....इन्द्रा

प्यार है तो जताया भी करो 
दर्द है तो बताया भी करो 
रूठे हुओं को मनाया भी करो 
जज़्बात छिपाये तो 
टीस उठेगी 
छिपाने की जगह दिखाया भी करो 
ज्यादा दिन दूर रहने से 
दूरियां बढ़ जाती हैं 
कभी कभी दोस्तों से मिल आया भी करो 
बिन मांगी सलाह बहुत देते हो मेरी जान
कभी अपनी सलाह पर भी अमल कर आया करो
-इन्द्रा
वर्डप्रेस

Saturday, June 22, 2019

ज़िंदगी और मौत ....इन्द्रा

मौत ने पूछा
ज़िंदगी एक छलावा है
एक झूठ है
हर दिन हर पल तुम्हारा साथ छोड़ती जाती है
फिर भी तुम उसे प्यार करते हो
मैं एक सच्चाई हूँ अंत तक तुम्हारा साथ निभाती हूँ
पर फिर भी तुम मुझसे नफरत करते हो
मुझसे डरते हो
मुझसे समझौता कर लो
फिर कोई डर तुम्हें डरा न पायेगा
मैंने कहा
तुम सत्य हो शाश्वत हो
अनिवार्य हो
पर तुमसे कैसे समझौता करलूं
तुम्हारी टाइमिंग बहुत गलत होती है
तुम गलत समय पर गलत लोगों को ले जाती हो
तुम गलत समय पर गलत तरीके से आती हो
पूछो उन बदनसीब अभिवावकों से
जिन्होंने खोय अपने लाल असमय
पूछो उन से ,
जिन्होंने ने गवाए अपने परिजन
आतंकवादियों के हाथों
उम्र थी जान गवाने की
फिर जो मजबूर, पीड़ित , बीमार
मरने की प्रार्थना करते हैं
उन्हें तुम तड़पने को छोड़ देती हो
बच्चों ,जवानों को अपना शिकार बनाती हो
कैसे करलूं तुमसे समझौता
तुम कड़वा सच हो, अनिवार्य हो पर
न्यायसंगत नहीं
काम से काम मेरी नज़र में तो नहीं
ज़िन्दगी लाख छलावा सही
मीठा झूठ सही
पर सुन्दर है जीने का,
लड़ने का हौसला देती है

-इन्द्रा


Friday, February 12, 2016

और फिर नारी ने कहा.....इन्द्रा












और फिर नारी ने कहा
हे नर !
मैं तो हमेशा से वहीँ हूँ 

जहाँ मुझे होना था 
न तुम्हारे आगे न पीछे 
न ऊपर न नीचे 
बस बराबरी में

मुझे तो कभी भी महान बनने की चाहत न थी 
तुम ही हमेशा  ऊंचा बनने की होड़ में लगे रहे 
महान बनने के रास्ते तो और भी थे
उन पर चल तुम ईश्वर बन सकते थे 
पर तुमने यह क्या किया ?   

मुझे नीचा  दिखाने की कोशिश में 
खुद से कमजोर जताने  की ख्वाहिश में 
खुद को महान दिखने  की चाहत में 
मुझ पर बलात्कार और जुर्म कर 
खुद को ही नीचा गिरा कर 
मुझ स्वतः ही  उपर  उठा दिया 

- इन्द्रा
मूल रचना


Monday, February 8, 2016

उड़ान....इन्द्रा
















हमें ही  जीने दो
मत थोपो अपने सपने
हमें  ही बुनने दो
अच्छे और बुरे का
बस फर्क तुम बता दो
कैसे गगन में उड़ना
इतना बस सिखा दो
लकीर के फ़क़ीर
बनना नहीं हमें
नए रस्ते अपने लिए
तलाशेंगे  खुद ही हम
तुम तो बस हमें
उड़ने को छोड़ दो
या साथ हो लो हमारे
नए नए सपने बुनो
सपने बनाने की
कोई उम्र होती नहीं
छोड रूढ़ीवाद  और
पुरानी परम्पराएँ
सब नया  नहीं है बुरा
विश्वास करके देखो
मेरा हाथ पकड़ कर
फिर से उड़ कर देखो
जब सब का साथ हो
कठनाई डर  के भागेगी
मंज़िल सच हमें
खुद ब खुद तलाशेगी
-इन्द्रा

मूल रचना

Wednesday, February 3, 2016

नासमझ दिल.......इन्द्रा











कितने सपने देखें
और कितना मन को मारें
दिल को कौन बताये
लाख जतन करो सब कुछ पालूं
फिर भी कुछ छूट ही जाये
दिल को कौन बताये
आधा छोड़ पूरे भाग न मनवा
जो है वो भी छिन ना जाये
दिल को कौन बताये
अपनी सीमा खुद पहचानो
जितनी चादर पाओं पसारो
दिल को कौन बताये
सब की अपनी मजबूरी है
कब तक कोई साथ निभाए
जब तक का है साथ किसीका
हंस कर ले बतियाये
दिल को कौन बताये

-इन्द्रा

मूल रचना