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Saturday, February 23, 2019

पाँव ..........शशांक पांडेय


जब भी चौखट पर आती है 
किसी स्त्री की परछाई
लगता है माँ फिर से दस्तक दे रही है जीवन में
उसके देह की महक
चूड़ियों की खनखनाहट
किसी के होने भर से
उसका मुस्कुराहट भरा वो चेहरा
अचानक घुमने लगता है 
मेरे चारों ओर
लेकिन वह नहीं आती 
वह सब परछाइयाँ 
धीरे-धीरे किसी अपरिचित की होने लगती है
माँ गयी तो 
जीवन के रंगमंच पर भी कभी नहीं आयी
मुझको और उदास करने के लिये
आती है तो केवल सपने में
यदि फिर किसी दिन आयेगी सपने में ही
तो उसे बिठा लूँगा बिल्कुल पास
और पूछूँगा-'कहाँ गयी थी इतने दिनों तक?'
मैं जानता हूँ
वह कुछ नहीं बोलेगी
बस अपने पास बुलाकर बालों में हाथ फेर देगी
उसके बाद 
मैं कुछ कह नहीं पाऊँगा।।

-शशांक पांडेय

Sunday, January 7, 2018

कठपुतली.....ज्योति साह


बना के कठपुतली नचाते रहो
रखो दोनों शिराओं को तलवे के नीचे
हमारा क्या है.....

तुम कहो तो हम उठें
तुम कहो तो बैठे

चाहो तो सांस लेने के भी
समय तय कर दो
और जब भी तुम बोलो
हम बजा दें ताली,

हाँ एक रस्सी भी 
बाँध दो टाँगों में
ताकि कहीं और का रूख 
ना कर सकें

बिठा दो पहरे आँखों पर
तुम्हारे दिखाये के सिवा 
कुछ देख ना सके,

सिल दो होंठ
कि तुम्हारे चाहे बिना
उसे हिला भी ना सकूं,

जकड़ दो पंखों को
कि लाख कोशिशों के बाद भी
स्वच्छन्द उड़ान भर ना सकूँ,

सुनो...
भले डाल दो काल-कोठारी में
बस एक झरोख़ा खुला रखना
ताकि जब निकले तुम्हारी झाँकी
झंडा फहराने को
तो जी भर उसे निहार सकूँ,

तुम्हारी जीत
और अपनी हार पे
सिर्फ़ और सिर्फ़ कुछ आँसू बहा सकूँ।


-ज्योति साह

Saturday, January 6, 2018

धूप के कुछ टुकड़े.....शिवराम के


पेड़ों की टहनियों से
धूप के टुकड़ों सा, तुम्हारी यादें
छनकर मेरे स्मृति पटल पर
सिमट जाती है.
आती हो अक्सर कुछ इसी तरह, फिर
हल्की हवा के चलने पर
टहनियों के इधर से उधर होने पर
दो पत्तियों के बीच
किसी  तीसरी पत्ती के आने से
रोशनी का कारवां
कुछ पल मानो कहीं खो सी जाती है/
धूप के कुछ टुकड़े
माना कि आंखों पर लगते हैं
त्वचा पर चुभते हैं
मस्तिष्क को भी बेचैन रखते हैं.
लेकिन... धूप के यही कुछ टुकड़े
सुकून देते हैं
जब जब कभी झुरमुट से  छनकर
स्मृति पटल पर सिमट जाते हैं.
सब कुछ ठीक वैसे ही लगता है
जैसे तुम किसी अंधेरी गली से निकल कर
इस मन से लिपट जाते हो
न जाने क्या कुछ इस मन को दे जाते हो.
धूप के ये कुछ टुकड़े न जाने क्यों
अंधेरी रात में नहीं आते
नहीं आते तुम भी
जब कभी जीवन के आकाश में
बादल बिखरे होते हैं.

- शिवराम के

Monday, January 1, 2018

कौन है हमसे बढ़के....केशव शरण

क्यों नसीबों की बात करते हैं
जब ग़रीबों की बात करते हैं 

फिर कहेंगे हमें उठाने को
वो सलीबों की बात करते हैं 

किनके अल्फ़ाज़ सबसे झूठे हैं
क्या अदीबों की बात करते हैं

जाइये मत अभी रक़ीबों पर
हम हबीबों की बात करते हैं 

कौन है हमसे बढ़के, आप अगर
बदनसीबों की बात करते हैं
-केशव शरण

Friday, September 1, 2017

प्रेम क्या भरे पेट की लग्ज़री है ?.....जया यशदीप घिल्डियाल

वो दिखा रही थी
"सोलापुर शादी व्हाट्सएप ग्रुप " में, 
लड़कों  के प्रोफाइल ।

भाभी!
इससे कुछ ही दिन पहले बात ख़त्म हुई
गोरा है ना ये ?
कार खरीदेगा शादी के बाद बोलता था
दुबई गया
एक ये है
अपने माँ -बाप से छुपाया इसने सब
मैं  थोड़ा  काली हूँ और घर-घर काम करती हूँ
इसके घर वाले नहीं माने

और एक ये
मुझसे कहता....
पहले रात को हस्बैंड-वाइफ वाली बातें करूं
फिर शादी का सोचेगा
मैंने ही ना कह दी

और इक ये
बस चैट करता था
फोन हमेशा उसके पिता करते
माँ बोली लड़के से बात करवा दो
वो बोले , शादी के बाद ....
अब उसने चैट बंद कर दी
मुझसे क्या गलती हुई ?
मैं  उससे प्यार  करने लगी थी
मैं बहुत रोई दस-पंद्रह दिन 

रंजो की शादी हुई ..
उसने मुझसे बात करनी छोड़ दी

श्यामा  का बेटा हुआ
उसकी मां ने उससे मिलने नहीं दिया
एक बच्चे को गोद में खिला रही थी
लोग समझे मेरा बेटा  है !

ओह !! अब मैं बच्चे की मां जैसी दिखने लगी ?
मैं  मोटी हो गई , पेट निकल आया ...
क्या मेरा चेहरा औरत सा लगने लगा ?
भाभी! उस दिन फिर मैं बहुत रोई
...तुझे किसी से तो प्यार होगा उससे ही शादी करना
प्यार करके शादी करने में ये सब प्रपंच नहीं  होते ।

दूधमुँही थी कि माँ  काम पर साथ  ले जाती , पिता गुजर गए थे
दस बारह साल में काम शुरू कर दिया – झाडू,पोछा,बर्तन
कितने ही मर्द थे !
कितनी ही आँखें!
जो नापती हर दिन बढती देह को
क्या करती एक तेरह – चौदह साल की लडकी

जब बर्तन मांज रही होती और 
मालिक निर्वस्त्र पीछे खड़ा हो जाता
मैं घबराई नहीं थी
हाथ – पाँव सुन्न नहीं हुए
मैं धक्का दे कर भागती रही
रौंदती कितनी ही नंग-धडंग देहों को
छब्बीस की पूरी हो गयी
मुझे  हुआ जब भी प्यार
उसमें  शादी कहाँ होती है ?

मुझे प्यार नहीं करना
अब मुझे शादी  करनी है
मुझे घर पर रहना  है
पर अब डर लगता है
क्या मेरी शादी  कभी नहीं  होगी ?
उसकी बातों  के बाद इक उलझन  सी रहती है
" प्रेम क्या भरे पेट की लग्ज़री " ?
-जया यशदीप घिल्डियाल

Monday, August 21, 2017

भरम का भरम लाज की लाज रख लो...सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

अजब नक - चढ़ा आदमी हूँ
जो तुक की कहो बे-तुका आदमी हूँ

बड़े आदमी तो बड़े चैन से हैं
मुसीबत मिरी मैं खरा आदमी हूँ

सभी माशा-अल्लाह सुब्हान-अल्लाह
हो ला-हौल मुझ पर मैं क्या आदमी हूँ

ये बचना बिदकना छटकना मुझी से
मिरी जान मैं तो तिरा आदमी हूँ

अगर सच है सच्चाई होती है उर्यां
मैं उर्यां बरहना खुला आदमी हूँ

टटोलो परख लो चलो आज़मा लो
ख़ुदा की क़सम बा-ख़ुदा आदमी हूँ

भरम का भरम लाज की लाज रख लो
था सब को यही वसवसा आदमी हूँ"।

-सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

Friday, August 18, 2017

इंतज़ार मत करना.....राजेश "ललित" शर्मा


इंतज़ार मत करना
अब मेरा
थक गये हैं पाँव
मुश्किल है चलना
मोड़ अभी भी बहुत हैं
ज़िंदगी के
याद कर लेना
कभी हो सके
मेरे अक्स को।
- राजेश "ललित" शर्मा 

Thursday, August 17, 2017

आईने.....पंकज कुमार शर्मा



बरसो से जड़े हैं..
तेरे घर में जो आईने
उनका खयाल करना
उनमें तेरे हर दौर की शक्ल है.
उन्होंने तेरी शक्ल को
संवारा है..
हर दाग को मिटाया है.
-पंकज कुमार शर्मा


Wednesday, August 16, 2017

हारना मैने कभी सीखा नहीं....कवि डी. एम. मिश्र


प्यार मुझको भावना तक ले गया
भावना को वन्दना तक ले गया।

रूप आँखों में किसी का यूँ बसा
अश्रु को आराधना तक ले गया।

दर्द से रिश्ता कभी टूटा नहीं
पीर को संवेदना तक ले गया।

हारना मैने कभी सीखा नहीं
जीत को संभावना तक ले गया।

मैं न साधक हूँ , न कोई संत हूँ
शब्द को बस साधना तक ले गया।

अब मुझे क्या और उनसे चाहिए
एक पत्थर, प्रार्थना तक ले गया।
-कवि डी. एम. मिश्र 
प्रस्तुतिः सुशील कुमार

Sunday, August 13, 2017

"मन खट्टा"....राजेश”ललित”शर्मा


मन खट्टा हो गया
चल यार
कैसी बात करता है
मन कभी मीठा हुआ
कभी सुना क्या?
नहीं न
यूँ ही जमी रहेगी दही
रिश्तों की
खटास रहेगी ही
चाहे जितना डालो चीनी
फिर मन खट्टा
हुआ तो हुआ
क्या करें?????
-राजेश”ललित”शर्मा

Monday, July 17, 2017

#हिन्दी_ब्लॉगिंग.. कुछ दिन पहले.....डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


कुछ दिन पहले इस किताब में -
महक रहे थे बरक नये।

जिल्दसाज तुम बतलाओ।
वे सफे सुनहरे किधर गये।

जहाँ इत्र की महक रवां थी।
जलने की बू आती है।

दहशत वाले बादल कैसे।
आसमान में पसर गये।

बूढ़ा होकर इंकलाब क्यों -
लगा चापलूसी करने।

कलमों को चाकू होना था।
क्यों चमच्च में बदल गये।

बंधे रहेंगे सब किताब में।
मजबूती के धागे से।

एक तमन्ना रखने वाले।
बरक-बरक क्यों बिखर गए।

जिल्दों से नाजुक बरकों को।
क्या तहरीर बचाएगी।

क्या मजनून बदलने होंगे।
गढ़ने होंगे लफ़्ज नए।

छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश

Saturday, July 15, 2017

सफल आदमी.......भास्कर चौधुरी

यह औरत ही है
जो घर को सम्हाल कर रखती है
कहा उसने
यह औरत ही है
जो आदमी को उसकी मंजिल तक पहुँचाती है
कहा उसने
और
सामाने बैठी औरतों की
ज़ोरदार तालियों के बीच
वह उतर आया
मंच से आहिस्ते आहिस्ते
झूमते झूमते !!


- भास्कर चौधुरी

Friday, July 14, 2017

ज़िंदगी ही से सवाल करता हूँ.......राजेश”ललित”शर्मा









समय ज़रा सरक
बैठने दे मुझे
अपने साथ
गुज़ारने दे चंद पल
कुछ करें बात
चलें कुछ क़दम
समझें हम तुम्हें
तुम हमें समझो
सच में बहुत
तेज़ चलते हो
रुको तो
सुनो तो
फिर निकल गये आगे
चलो मैं ही दम भरता हूँ
ज़िंदगी ही से सवाल करता हूँ
जवाब जब मिलेगा
सो मिलेगा।
-राजेश”ललित”शर्मा 

Saturday, July 8, 2017

आदतन नाम आ गया लब पर तेरा......नकुल गौतम

अब मेरे दिल में नहीं है घर तेरा
ज़िक्र होता है मगर अक्सर तेरा

हाँ! ये माना है मुनासिब डर तेरा
आदतन नाम आ गया लब पर तेरा

भूल तो जाऊँ तुझे पर क्या करूँ
उँगलियों को याद है नम्बर तेरा

कर गया ज़ाहिर तेरी मजबूरियां
टाल देना बात यूँ हँस कर तेरा

शुक्र है! आया है पतझड़ लौट कर
बाग़ से दिखने लगा फिर घर तेरा

वो मुलाक़ात आख़िरी क्या खूब थी
भूल जाना लाश में खंजर तेरा

कोई बतलाये अगर मैं हूँ किधर
तब तो शायद बन सकूँ रहबर तेरा

हैं क़लम की भी तो कुछ मजबूरियाँ
थक गया हूँ नाम लिख लिख कर तेरा

बावरेपन की 'नकुल' अब हद हुई
इश्क़ उसको? वो भी मुझसे? सर तेरा!

Monday, July 3, 2017

‘मुस्कान’.....डॉ० छेदी साह

















मुर्दे में भी डाल देगी जान
उषा की प्रथम किरणों सा
तुम्हारी लम्बी बाहें
संगमरमरी देह
बालों पर
छाई सावन की घटा
हिरणी सी आँखें
देखती हो जब तुम

और होती आँखें चार
तब तुम्हारी मीठी मुस्कान
मुझे लगती है
बड़ी ही कान्तिमान,
-डॉ० छेदी साह 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Friday, June 30, 2017

‘शब्द-साधना’.............मुकेश बोहरा अमन

शब्दों को जानो, शब्दों को मानो ,
शब्दों की बातें होती निराली ।

शब्दों का व्यापार, शब्दों का व्यवहार ,
शब्दों से है होली, दीवाली ।।

शब्दों से तुम हो , शब्दों से मैं हूँ ।
शब्दों से हारा , शब्दों से जय हूँ ।।

शब्द है करेला व अम्बुआ की डाली ।
शब्दों की बातें होती निराली ।।

शब्द है नौका , लहरों का झोंका ।
कभी देते उलझा, कभी देते मौका ।।

अदब से सवारी , शब्दों की आली ।
शब्दों की बातें होती निराली ।।

शब्दों से रिश्ते, शब्दों से घिसते ।
शब्दों से खेले , कभी हम पिसते ।।

शब्दों से प्रीति , शब्दों से जाली ।
शब्दों की बातें होती निराली ।।

शब्दों के अपने होते हैं सौ अर्थ ।
अमन शब्द पूजो, करो ना कभी व्यर्थ ।।

शब्द कटारी, है फूलों की डाली ।
शब्दों की बातें होती निराली ।।


Wednesday, June 28, 2017

ईश्वर की कृपा जीवलोक तक.....नीरू मोहन

जापानी काव्य शैली ताँका

संरचना- 5+7+5+7+7= 31 वर्ण
दो कवियों के सहयोग से काव्य सृजन 
पहला कवि-5+7+5 = 17 भाग की रचना , 
दूसरा कवि 7+7 की पूर्ति के साथ श्रृंखला को पूरी करता |
पूर्ववर्ती 7+7 को आधार बनाकर अगली श्रृंखला 5+7+5 यह क्रम चलता रहता है इसके आधार पर अगली श्रृंखला 7+7 
की रचना होती है| इस काव्य श्रृंखला को रेंगा कहते थे |
5+7+5+7+7= 31 वर्ण

प्रभु भजन
प्राकृतिक सौंदर्य
उत्साही मन
नई ऊषा किरण
नवप्रभात संग
नई उमंग
नव चेतना लिए
धरा प्रसन्न
हर्षित जन-जन
उल्लासित है मन
विहग करें
सुरीला कलरव
मन मयूर
तन डोले बे-ताल
सुहावनी प्रभात
अरूण संग
स्वर्णिम गगन
मलय बहे
सुगंधित भू-तल
जीवलोक प्रसन्न ।।

Wednesday, June 21, 2017

चुप..........भास्कर चौधुरी









पिता के पिता ने कहा
पिता से
चोप्प
दुबक गए पिता
किताबों की अलमारी के पीछे

पिता ने मुझसे कहा
चुप
मैंने दरवाजा खोला
बाहर निकल गया घर से
और  बाहर ही रहा
खाने के वक्त तक
घूमता रहा इधर-उधर
बेमतलब

मैंने बेटी से कहा
चुप्प
उसने पलट कर जवाब दिया !!
-भास्कर चौधुरी

Monday, May 29, 2017

संवेदनाओं का पौधा.... भावना












अधिकांश औरतें
जब व्यस्त होती हैं खरीदने में
साड़ी और सलवार सूट

तो लेखिकाएं खरीदती हैं
अपने लिए
कुछ किताबें ,पत्रिकाएॅ और कलम

अधिकांश औरतें
जब ढूंढती हैं
इन्टरनेट पर
फैशन का ट्रेंड

तो लेखिकाएं तलाशती हैं
ऑनलाइन किताबों की लिस्ट

अधिकांश औरतें
जब नाखून में नेलपाॅलिश
पैरों मे महावर लगा
करती हैं खुद को सुंदर दिखने की जतन

तो लेखिकाएं
रंग छोड़ती नाखूनों से
पलटती हैं किताबों के पन्ने
या रिश्तों की मजबूती के लिए
शब्दों से उगाती हैं
संवेदनाओं का पौधा











-भावना 
मुजफ्फरपुर, बिहार.

Friday, May 26, 2017

वसुधैव कुटुम्बकम.................प्रभांशु कुमार


ना मुसलमान खतरे में है
ना हिन्दू खतरे में है
धर्म और मजहब से बँटता
इंसान खतरे में है

ना राम खतरे में है
ना रहमान खतरे में है
सियासत की भेंट चढ़ता
भाईचारा खतरे में है

ना कुरान खतरे में है
ना गीता खतरे में है
नफरत की दलीलों से
इन किताबों का ज्ञान खतरे में है

ना मस्जिद खतरे में है
ना मंदिर खतरे में है
सत्ता के लालची हाथों
इन दीवारों की बुनियाद खतरे में है

धर्म और मजहब का चश्मा
उतार कर देखो दोस्तों
अब तो हमारा
हिन्दुस्तान खतरे में है

-प्रभांशु कुमार
133/11ए अवतार टॉकीज के पीछे तेलियरगंज
इलाहाबाद- 211004
मो-7376347866