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Sunday, September 1, 2019

तबीयत हमारी है भारी ....वीरेन्द्र खरे ’अकेला’

तबीयत हमारी है भारी सुबह से 
कि याद आ गई है तुम्हारी सुबह से 

न थी घर में चीनी तो कल ही बताती 
करेगा न बनिया उधारी सुबह से 

बता दे कि हम ख़ुद ही सोए थे भूखे 
खड़ा अपने द्वारे भिखारी सुबह से 

न उसकी हमारी अदावत पे जाओ 
हुआ रात झगड़ा, तो यारी सुबह से 

हुआ अपशगुन ये कि इक नेता जी पे 
नज़र पड़ गई है हमारी सुबह से 

परिन्दों की दहशत है वाजिब 'अकेला'
खड़े हर तरफ़ हैं शिकारी सुबह से
-वीरेन्द्र खरे 'अकेला'

Saturday, August 31, 2019

अंकों का मिलन .....डॉ. कौशल श्रीवास्तव

एक चतुर शिक्षक ने पूछा 
“एक प्लस एक का मान बताओ।” 
बेंच पर सामने बैठे विद्यार्थी ने कहा “दो” 
“तुम गणितज्ञ या वैज्ञानिक बनोगे 
सच्चाई के वृत्त में भ्रमण करोगे।” 
उन्होंने पुनः पूछा “कोई दूसरा उत्तर?” 
किसी ने सकुचाते हुए कहा “तीन” 
“तुम व्यापारी बनने के क़ाबिल हो 
मौक़ा मिले तो इसे आज़माओ।” 
उन्होंने फिर कहा “कोई अन्य उत्तर?” 
पिछली बेंच से आवाज़ आयी “एक” 
शिक्षक ने पूछा “इसका क्या अर्थ?” 
उस विद्यार्थी ने कहा 
“यह प्रश्न आपके लिए है 
आप सोचिये, यह आपकी परीक्षा भी है 
यदि आप फ़ेल हो गए 
तो कल मैं क्लास में उत्तर बताऊँगा।” 

शिक्षक चतुर थे, सोचते रहे 
किन्तु किसी तार्किक निष्कर्ष से दूर रहे 
इसी चिन्तन में रात बिताई 
दूसरे दिन क्लास में जल्दी पहुँच गए 
“हाँ, बताओ अपने उत्तर का अर्थ 
मुझे समझ लो असमर्थ।” 
विजयी स्वर में विद्यार्थी ने कहा 
“एक जोड़ एक से बनता है एक 
जब हो प्यार का अभिषेक 
प्रेमी और प्रेमिका हो जाते हैं एक 
यह है श्रृंगार रस का विवेक 
किन्तु गणित या व्यापार से बहुत दूर।” 

शिक्षक महोदय ने निर्णय दिया 
“तुम एक कवि बनोगे 
जो कल्पना की दुनिया में जीते हैं 
बिना व्यापार किये ही 
साधन संपन्न होना चाहते हैं 
गणित को अपना दुश्मन समझते हैं।”   

क्लास की गम्भीरता को चीरते हुए 
एक साहसी विद्यार्थी ने पूछा 
“मैंने कहते सुना है 
एक और एक बनाते हैं ग्यारह 
जिसका अर्थ है मेरी समझ से बाहर 
क्या डालेंगे प्रकाश इस पर?” 
कोई मजाकिया विद्यार्थी बोल उठा 
“जब किसी पति-पत्नी ने नौ बच्चे पैदा किये 
तो एक और एक मिलकर बन गए ग्यारह 
राजनीति में यह आज भी चर्चित है 
क्योंकि प्रजातन्त्र में संख्या महत्वपूर्ण है।” 
हँसी की गूँज क्लास में फैल गई  
आज की पढ़ाई ख़त्म हुई!! 
-डॉ. कौशल श्रीवास्तव

Wednesday, June 19, 2019

जीवन बड़ा रचनाकार है ....राहुलदेव गौतम

जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
असत्य के शब्दों से,
सत्य का अर्थ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो कभी शाश्वत हुआ न हो,
ऐसे कल्पनाओं का भरमार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो बिखरा हुआ है,
ख़ुद ज़िम्मेदारियों के शृंखला में,
वो टूटे हुए सपनों का हार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

फँस जाते है स्वयं इसमें,
लक्ष्यों का अरमान,
ऐसे जालों का जंजाल रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

ख़ुद में खो जाता है,
ख़ुद में पा जाता है,
ऐसे इच्छाओं का संसार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जिससे मतलब की बात निकले,
जितना जिससे परिहास निकले,
ऐसे शख़्सों का अम्बार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

पल में रूप,
पल स्वरूप,
ऐसे सच-झूठ का नक़ाब बुनता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जितना घावों में ठीक लगे,
उतना ही गुनगुना लेता है,
ऐसे ही नग़मों की आवाज़ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
-राहुलदेव गौतम

Wednesday, June 5, 2019

उगाने होंगे अनगिन पेड़.....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

आज पर्यावरण दिवस पर विशेष
मत काटो तुम ये पेड़
हैं ये लज्जावसन
इस माँ वसुन्धरा के।
इस संहार के बाद
अशोक की तरह
सचमुच तुम बहुत पछाताओगे; 
बोलो फिर किसकी गोद में
सिर छिपाओगे? 
शीतल छाया
फिर कहाँ से पाओगे ? 
कहाँ से पाओगे फिर फल? 
कहाँ से मिलेगा? 
सस्य श्यामला को 
सींचने वाला जल? 
रेगिस्तानों में
तब्दील हो जाएँगे खेत
बरसेंगे कहाँ से 
उमड़-घुमड़कर बादल? 
थके हुए मुसाफ़िर
पाएँगे कहाँ से
श्रमहारी छाया? 
पेड़ों की हत्या करने से 
हरियाली के दुश्मनों को
कब सुख मिल पाया? 
यदि चाहते हो –
आसमान से कम बरसे आग
अधिक बरसें बादल, 
खेत न बनें मरुस्थल, 
ढकना होगा वसुधा का तन
तभी कम होगी
गाँव–नगर की तपन।
उगाने होंगे अनगिन पेड़
बचाने होंगे
दिन-रात कटते हरे-भरे वन।
तभी हर डाल फूलों से महकेगी
फलों से लदकर
नववधू की गर्दन की तरह
झुक जाएगी
नदियाँ खेतों को सींचेंगी
सोना बरसाएँगी
दाना चुगने की होड़ में
चिरैया चहकेगी
अम्बर में उड़कर
हरियाली के गीत गाएगी
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

कविता तुम कहाँ हो .....प्रभांशु कुमार

कविता 
तुम कहाँ हो
कवि के हृदय में 
या काग़ज़ के पन्नों पर
या मन की संवेदना में 
या ऊष्मित होती वेदना में 
या बालाओं के रुदन में
या उद्वेगों के क्रन्दन में।
बताओ हो किसी की
स्मृतियों में 
या नायिकाओं के विरहगान में 
या छिपी हो सुर-ताल में 
या उलझी हो समुद्र के 
भँवर-जाल में।
बताओ तो छिपी कहाँ 
सुंदर सूरत में 
या अच्छी सीरत में 
या फिर चरित्र में 
आख़िर कहो तो 
हो बसती किसमें।
कहीं छिपी तो नहीं 
सैनिकों की ललकार में 
या मल्लाह के पतवार में
या नदी के बीच मझधार में 
या आन्दोलन से उपजे 
हाहाकार में।
कहाँ हो कविता
शब्दों के ताने-बाने में 
या कही गई जो बात 
अनजाने में 
पनघट पर पनिहारन के 
गुनगुनाने में 
या रंगीन परों वाली तितलियों के
उड़ जाने में।
कहाँ हो कविता 
आख़िर हो कहाँ 
मुझे तो लगता है
तुम हर जगह हो
हर किसी का सपना हो
या हो किसी के सपनों में।
हाँ तुम हो
वन की हरियाली में 
पर्वत, पहाड़ में 
कलकल करती झरने में
और हो कण-कण में 
जहाँ प्राण शेष है
अभी भी 
हाँ! अभी भी।
-प्रभांशु कुमार

Monday, June 3, 2019

बेचैन आवाज़ .....राहुलदेव गौतम

अफ़सोस किस बात का करूँ,
दिल तो मिला था पलभर,
लेकिन विचार नही मिले थे पल भर।

किसी से भी किसी तरह नहीं,
दुनिया की खब़र वो देकर चले गये,
उन्हें कानों-कान ख़बर नहीं चला,
हम उनके लिए कितने दर्द सह गये।

वो समभाव था या डर था,
एक को समझकर वो रुक गये,
एक को हम अपनाकर चलते-चले गये।

 फूल भी नहीं थे तो अंगारे भी नहीं थे,
वो जो थे वो थे ही,
जो बचा इनमें से दूसरा,
उससे जल कर हम राख़ हो गये।

जीवन का झंझावत हमें दूर रखता है,
फिर से उनके हिसाब से जीने में,
जो मैं पहले था उसी तरह जीते चले गये।

न कल्पना में कुछ था,
न हक़ीक़त में कुछ हाथ लगा,
मैं खाली था हम खाली रह गये।
-राहुलदेव गौतम

Sunday, June 2, 2019

प्रक्रिया .....डॉ. भावना कुँअर

बीज - अंकुर - पौधा - पेड़ -
फूल - फल -
पकना -
फिर बीज बनना
फिर वही मिट्टी- वही पानी-
वही धूप- वही छाया-
वही अंकुर- वही पौधा-
वही पेड़- वही फल-
बस यही प्रक्रिया है
अनन्त तक
-डॉ. भावना कुँअर

Sunday, May 12, 2019

माँ .....डॉ. कविता भट्ट

माँ जब मैं तेरे पेट में पल रही थी
मेरे जन्म लेने की ख़ुशी का रास्ता देखती 
तेरी आँखों की प्रतीक्षा और गति
उस उमंग और उत्साह को
यदि लिख पाती 
तो शायद मैं लेखिका बन जाती

 पहाड़ के दुरूह
चढ़ाई-उतराई वाले रास्तों पर
घास-लकड़ी-पानी और तमाम बोझ के साथ
ढोती रही तू मुझे अपने गर्भ में
तेरे पैरों में उस समय जो छाले पड़े
उस दर्द को यदि शब्दों में पिरो लेती
तो शायद मैं लेखिका बन जाती

 तेज़ धूप-बारिश-आँधी में भी
तू पहाड़ी सीढ़ीदार खेतों में
दिन-दिन भर झुककर 
धान की रोपाई करती थी
पहाड़ी रास्तों पर चढ़ाई-उतराई को 
नापती तेरी आँखों का दर्द और
उनसे टपकते आँसुओं का हिसाब
यदि मैं काग़ज़ पर उकेर पाती
तो शायद मैं लेखिका बन जाती

 तेरी ज़िंदगी सूखती रही
मगर तू हँसती रही
तेरे चेहरे की एक-एक झुर्री पर
एक-एक किताब अगर मैं लिख पाती
तो शायद मैं लेखिका बन जाती

 आज मैं हवाई जहाज़ से उड़कर
करती रहती हूँ देश-विदेश की यात्रा
मेरी पास है सारी सुख-सुविधा
गहने-कपड़े सब कुछ है मेरे पास
मगर तेरे बदन पर नहीं था 
बदलने को फटा-पुराना कपड़ा
थी तो केवल मेहनत और आस
मैं जो भी हूँ तेरे उस संघर्ष से ही हूँ
उस मेहनत और आस का हिसाब
काश! मैं लिख पाती 
तो शायद मैं लेखिका बन जाती ...
-डॉ. कविता भट्ट

Saturday, May 11, 2019

श्रृंगार है हिन्दी ....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

खुसरो के हृदय का उद्‌गार है हिन्दी।
कबीर के दोहों का संसार है हिन्दी॥

मीरा के मन की पीर बन गूँजती घर-घर।
सूर के सागर - सा विस्तार है हिन्दी॥

जन-जन के मानस में, बस गई जो गहरे तक।
तुलसी के 'मानस' का विस्तार है हिन्दी॥

दादू और रैदास ने गाया है झूमकर।
छू गई है मन के सभी तार है हिन्दी॥

'सत्यार्थप्रकाश' बन अँधेरा मिटा दिया।
टंकारा के दयानन्द की टंकार है हिन्दी॥

गाँधी की वाणी बन भारत जगा दिया।
आज़ादी के गीतों की ललकार है हिन्दी॥

'कामायनी' का 'उर्वशी’ का रूप है इसमें।
'आँसू’ की करुण, सहज जलधार है हिन्दी॥

प्रसाद ने हिमाद्रि से ऊँचा उठा दिया।
निराला की वीणा वादिनी झंकार है हिन्दी॥

पीड़ित की पीर घुलकर यह 'गोदान' बन गई।
भारत का है गौरव, श्रृंगार है हिन्दी॥

'मधुशाला' की मधुरता है इसमें घुली हुई।
दिनकर के 'द्वापर' की हुंकार है हिन्दी॥

भारत को समझना है तो जानिए इसको।
दुनिया भर में पा रही विस्तार है हिन्दी॥

सबके दिलों को जोड़ने का काम कर रही।
देश का स्वाभिमान है, आधार है हिन्दी॥
रामेश्वर काम्बोज
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Wednesday, May 8, 2019

मेरी माँ ....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

ढिबरी के नीम उजाले में
पढ़ने मुझे बिठाती माँ।

उसकी चक्की चलती रहती
गाय दूहना, दही बिलोना
सब कुछ करती जाती माँ।

सही वक़्त पर बना नाश्ता
जी भर मुझे खिलाती माँ।
घड़ी नहीं थी कहीं गाँव में
समय का पाठ पढ़ाती माँ।

छप्पर के घर में रहकर भी
तनकर चलती–फिरती माँ।
लाग–लपेट से नहीं वास्ता
खरी-खरी कह जाती माँ।

बड़े अमीर बाप की बेटी
अभाव से टकराती माँ।
धन–बात का उधार न सीखा
जो कहना कह जाती माँ

अस्सी बरस की इस उम्र ने
कमर झुका दी है माना।
खाली बैठना रास नहीं
पल भर कब टिक पाती माँ।

गाँव छोड़ना नहीं सुहाता
शहर में न रह पाती माँ।
वहाँ न गाएँ, सानी-पानी
मन कैसे बहलाती माँ।

कुछ तो बेटे बहुत दूर हैं
कभी-कभी मिल पाती माँ।
नाती-पोतों में बँटकर के
और बड़ी हो जाती माँ।

मैं आज भी इतना छोटा
है कठिन छूना परछाई।
जब–जब माँ माथा छूती है
जगती मुझमें तरुणाई।

माँ से बड़ा कोई न तीरथ
ऐसा मैंने जाना है।
माँ के चरणों में न्योछावर
करके ही कुछ पाना है।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Monday, April 15, 2019

क्षण दोष .........शेष अमित

नदी जब बहती है
तो घुला लेती है अपने में,
राह की भाषा-
कुछ मन की, कुछ तन की
और कुछ जो परे हैं इनसे,
उद्गम का वह बाल जल-बिन्दु,
मुहाने तक आते-आते,
ज्ञान और अनुभव से झुक गया है थोड़ा,
एक बार बाढ़ के समय,
मेरे गाँव के तालाब से मिला था,
तब से उसमें प्रेम का छाया-दोष है,
कई बार अकबका जाता है,
आस्मां को ताकता है शून्यता भर अंदर-
जबकि नज़र होनी थी ज़मीन पर,
सागर में विलीन होकर भी,
आंय-बांय-सांय बकता है,
पीछे घूमकर देखता है,
अंधी आँखों से छूटे राह को,
निबद्ध और दीवाना!
-शेष अमित

Friday, April 21, 2017

लेखनपुर की प्रेम कथा......अख़तर अली

बहुत समय पहले की बात है, लेखनपुर नामक गाँव में एक युवक और युवती रहा करते थे । युवती का नाम कविता और युवक का नाम कहानी था । कविता और कहानी के प्रेम के चर्चे सिर्फ लेखनपुर मे ही नहीं बल्कि आस पास के गाँव में हुआ करते थे । लोग इनकी तुलना लैला-मजनू और शीरी-फरहाद से किया करते थे । बड़े बुजुर्ग तो यहाँ तक कहा करते थे कि कविता और कहानी से ही लेखनपुर आबाद है, कोई कहता कविता और कहानी के रहने से ही लेखनपुर की पहचान बनी है। कविता और कहानी की मौजूदगी से लेखनपुर भी आनंदित था ।
अचानक एक दिन लेखनपुर में एक अजनबी आदमी आया। उसकी बुरी नज़र कविता और कहानी की जोड़ी पर पड़ी और उसी दिन से कविता और कहानी के बुरे दिन शुरू हो गये। वह अजनबी आदमी धीरे-धीरे संदिग्ध होने लगा, उसने कविता और कहानी को सब्ज़-बाग दिखाने शुरू कर दिये, उसने इनके दिमाग में यह बात बैठा दी कि यहाँ लेखनपुर मे तुम्हारी कोई पहचान नहीं बन पा रही है तुम मेरे साथ चलो फिर देखो मैं तुम्हें कहाँ से कहाँ पहुँचा देता हूँ । कविता और कहानी उस धोखेबाज के चक्कर में आ गये और अपने आप को पूरी तरह से उसके हवाले कर दिया। उस दिन के बाद से आज तक लेखनपुर में कविता और कहानी को नहीं देखा गया। किसी को पता ही नहीं चला कि आखिर ये दोनों का क्या हुआ? बहुत समय बाद केवल इतना ही पता चला कि उस संदिग्ध आदमी का नाम प्रकाशक था ।

-अख़तर अली

Wednesday, April 19, 2017

क्योंकि औरत कभी बूढ़ी नहीं होती....डॉ. मोहम्मद युनूस बट







पहले बुढ़ापा कलात्मक होता था आज कल भयानात्मक होता है। यह इस पर निर्भर करता है कि आप बुढ़ापे की दुनियां मैं जवानी के कौन से रास्ते से दाख़िल हुए हैं। विशेषज्ञों ने दावा किया है कि 2035 तक देश में बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जायेगी। अब ये तो दुनियां का नियम है कि यहाँ अगर कोई चीज़ बहुत ज़्यादा मात्रा में है तो उसकी क़ीमत बहुत कम हो जाती है। कालेज के प्रोफ़ेसर ने पाँच लड़कों को कक्षा में खड़ा किया और कहा - तुम चार लड़कों के दिमाग़ की क़ीमत पाँच सौ रुपये प्रति ग्राम और मेरे से कहा - तुम्हारे दिमाग़ की क़ीमत ड़बल यानी हज़ार रुपये प्रति ग्राम है। अपने दिमाग़ क़ीमत जान कर मैं पूरी तरह ख़ुश हो भी नही पाया था कि प्रोफ़ेसर साहब ने बताया कि जो वस्तु बहुत कम मात्रा में पाई जाती है उसकी क़ीमत हमेशा बहुत अधिक होती है। मुझे लगता है बूढ़ों की बढ़ती तादाद से उनकी मार्केट वैल्यू एकदम घट जायेगी । जनसंख्या रोकने के तरीक़े ढूँढ़ निकाले बुढ़ापा रोकने का कोई उपाय नहीं है। अब जब चारों तरफ़ बूढ़े ही बूढ़े हो जायेंगे तो उन्हें बूढ़ा समझ उनकी इज़्ज़त कौन करेगा?
बूढ़ों को हमारे समाज में वही स्थान प्राप्त है जिस स्थान पर वह बैठे रहते हैं। हम बूढ़ों के ख़िलाफ़ नहीं क्योंकि हमें भी एक दिन बूढ़ा होना है लेकिन बूढ़े हमारे ख़िलाफ़ रहते हैं क्योंकि उन्हें अब कौन सा जवान होना है?
हमारे यहाँ बूढ़े नसीहत देने के काम आते हैं। एक बूढ़े ने बच्चे को नसीहत देते हुए कहा - बेटे अपनी बाईक की रफ़्तार उतनी ही रखना जितनी मेरी दुआओं की रफ़्तार है यानी चालीस किलो मीटर प्रति घंटा, ये उनकी दुआओं की रफ़्तार है, नसीहतों की रफ़्तार बाईक की रफ़्तार जैसी है।
बूढ़े हमेशा ये सोच कर परेशान रहते हैं कि नई पीढ़ी बड़ी होकर क्या करेगी? वह भी यही सोच कर परेशान रहेगी कि ऩई पीढ़ी बड़ी होकर क्या करेगी?
एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार पच्चीस प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि बूढ़े एकदम खाली रहते हैं जबकि तीन प्रतिशत बूढ़े भी इस रिपोर्ट से सहमत नहीं हैं उन सब का कहना है कि हमारे पास पल भर की भी फ़ुरसत नही है। दरअसल जवान जिस काम को पाँच मिनट में कर के दिन भर खाली बैठे रहते हैं, बूढ़े उसी पाँच मिनट के काम को करने में पूरा दिन लगा देते हैं लिहाज़ा उनके पास पाँच मिनट का भी टाईम नहीं होता। बुढ़ापे की बस एक ही बीमारी है और वह है बुढ़ापा और बुढ़ापे के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
बुढ़ापे में अक्सर भूल जाने की आदत होती है। तीन बूढ़े आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा - जब मैं सीढ़ियों के बीच में पहुँचता हूँ तब भूल जाता हूँ कि मेरे को चढ़ना है या उतरना, दूसरे ने कहा - जब मैं फ्रिज खोलता हूँ तो भूल जाता हूँ कि मेरे को कुछ रखना है या निकालना है, तीसरे ने कहा - मैं कभी कभी यही भूल जाता हूँ कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। वैसे मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि आप किसी भी बूढ़े को झाड़ेंगे तो उसमें से एक जवान आदमी निकलेगा।
कहते है स्वर्ग में कोई बूढ़ा नहीं होता और अगर यहाँ बूढ़ों की संख्या बढ़ती गई तो फिर इस देश के स्वर्ग बनने की कोई संभावना नहीं रहेगी।
अब जो लोग कहते हैं कि 2035 तक बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जायेगी उन्हें मैं ये भी बता दूँ उस वक़्त जो बूढ़े होंगे वो बुढ़ापे की सभी परिभाषायें बदल देंगे क्योंकि उस वक़्त हम बूढ़े होंगे।
एक बात और बुढ़ापे की सभी बातें बूढ़े पुरुषों के बारे में ही होती हैं बूढ़ी औरतों के बारे में नहीं, क्योंकि औरत कभी बूढ़ी नहीं होती।

लेखक - डॉ. मोहम्मद युनूस बट
अनुवाद - अख़तर अली


Tuesday, October 18, 2016

सफ़र में.............सुशील यादव

तुम बाग़ लगाओ, तितलियाँ आएँगी
उजड़े गाँव नई बस्तियाँ आएँगी

जिन चेहरों सूखा, आँख में सन्नाटा
बादल बरसेंगे, बिजलियाँ आएँगी

दो चार क़दम जो, चल भी नहीं पाते
हिम्मत की नई, बैसाखियाँ आएँगी

उम्मीद की बंसी, बस डाले रखना
क़िस्मत की सब, मछलियाँ आएँगी

सफ़र में अकेले, हो तो मालूम रहे
तेरे सामने भी, दुश्वारियां आएँगी

नाकामी अंदाज़ में, कुछ नये छुपाओ
अख़बार छप के, सुर्खियाँ आएँगी

-सुशील यादव

Thursday, June 2, 2016

लड़की दो कविताएँ....डॉ. ऋतु त्यागी

लड़की - १

लड़की
सोचा करो 
बोलने से पहले
क्योंकि तुम्हारे बोलने से
डोलने लगती है
पैरों के नीचे की धरती
संकट में पड़ जाते हैं अस्तित्व।
.....


लड़की - २
लड़की
तुम्हारे लबों पर बैठी 
ख़ामोशी चाबी है
घर की ख़ुशी की
जिससे खुल जाता है
ख़ुशी का कोई भी दरवाज़ा
पर
उस दरवाज़े के भीतर से
झाँकते तुम्हारे चेहरे पर
पड़ गईं हैं
दर्द की कभी न 
मिटने वाली दरारें।

-डॉ. ऋतु त्यागी

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