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Tuesday, January 24, 2017

कविता के अभयारण्य में.....राकेश रोहित



जब कुछ नहीं रहेगा  
क्या रहेगा? 
मैं पूछता हूँ बार-बार  
भरकर मन में चिंता अपार 
कोई नहीं सुनता... 
मैं पूछता हूँ बार-बार। 

लोग हँसते हैं  
शायद सुनकर,  
शायद मेरी बेचैनी पर  
उनकी हँसी में मेरा डर है- 
जब कुछ नहीं रहेगा  
क्या रहेगा? 

नहीं रहेगा सुख  
दुःख भी नहीं  
नहीं रहेगी आत्मा, 
जब नहीं रहेगा कुछ  
नहीं रहेगा भय। 

कोई नहीं कहता रोककर मुझे 
मेरा भय अकारण है  
कि नष्ट होकर भी रह जायेगा कुछ  
मैं बार-बार लौटता हूँ  
कविता के अभयारण्य में  
जैसे मेरी जड़ें वहाँ हैं। 

मित्रों, मैं कविता नहीं करता  
मैं खुद से लड़ता हूँ 
- जब नहीं रहेगा कुछ  
क्या रहेगा?

-राकेश रोहित

Monday, January 23, 2017

लिखता नहीं तो.... राकेश रोहित
















लिखता नहीं तो मर जाता
आत्मा के अंधेरे में
उन्हीं शब्दों की रोशनी है

जो मैं तुम्हें यादकर
निर्जन में गाता !

कहता नहीं तो ढह जाता
जैसे ढह जाता है कोने का वीराल घर
जहां एकांत में बहे आंसुओं की सीलन है
और है किसी पुराने पन्ने में लिखा तुम्हारा नाम !

कही गई बात है फिर भी कहता हूँ
जैसे खिलता है खिला हुआ फूल
जैसे पुकारता हूँ तुमको सदियों पुराने नाम से
तो प्रथम स्पर्श से सिहरती है
धरती की सारी सुन्दरताएँ !

लिखता नहीं तो मैं मर जाता
कहते हुए मैं रोता हूँ  विकल, विह्वल
मैं जिस ईश्वर को याद करता हूँ
क्या वह तुम्हारी स्मृति से रचा गया है !

-राकेश रोहित