जंगल की कंदराओं से निकल तुम ।
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम ।
क्यूँ हो अभी भी दानव इतने तुम !
अत्याचार ये..इतने वीभत्स वार क्यूँ ?
मानवता आज भी इतनी निढाल क्यूँ ?
बलात्कार हिंसा यह लूटमार क्यूँ ?
साथ थी विकास में संस्कृति के वह ।
उसका ही इतना तिरस्कार क्यूँ ?
प्रकट न हुआ था प्रेम-तत्व तब ।
स्व-स्वार्थ निहित था आदिमानव तब ।
एक माँ ने ही सिखाया होगा प्रेम तब ।
उमड़ पड़ा होगा छातियों से दूध जब ।
संभाल कर चिपकाया होगा तुझे तब ।
माँस पिंड ही था ..एक तू इंसान तब ।
न जानती थी फर्क..नर-मादा का तब |
आज मानव जानके भी अनजान क्यूँ ?
जंगल की कंदराओं से निकल..तुम |
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम ।
क्यूँ हो अभी भी ..दानव इतने तुम !
अत्याचार ये..इतने वीभत्स वार क्यूँ ?
-अलका गुप्ता 'भारती'