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Friday, October 23, 2020

तस्वीर बोलती है __अलका गुप्ता 'भारती'


निकली ही क्यूँ ...
नंगे पाँव गोरी ।
दिखी नहीं ता पै...
धूप निगोड़ी ॥ 
नाजुक कमरिया...
थामें  गगरिया ।
रूप साजे हाय !
धारि ..कटरिया ॥
जालिम है जमाना...
ये ..नजरिया ।
संभल मग भरे...
शूल कंकरिया ॥
लद गए दिन ...
पनिहार पनघट के ।
जंचे अब ना ये ...
लटके झटके ॥

-अलका गुप्ता 'भारती' 







Monday, February 17, 2020

दानव ....अलका गुप्ता 'भारती'

जंगल की कंदराओं से निकल तुम ।
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम ।
क्यूँ हो अभी भी दानव इतने तुम !
अत्याचार ये..इतने वीभत्स वार क्यूँ ?

मानवता आज भी इतनी निढाल क्यूँ ?
बलात्कार हिंसा यह लूटमार क्यूँ ?
साथ थी विकास में संस्कृति के वह ।
उसका ही इतना तिरस्कार क्यूँ ?

प्रकट न हुआ था प्रेम-तत्व तब ।
स्व-स्वार्थ निहित था आदिमानव तब ।
एक माँ ने ही सिखाया होगा प्रेम तब ।
उमड़ पड़ा होगा छातियों से दूध जब ।

संभाल कर चिपकाया होगा तुझे तब ।
माँस पिंड ही था ..एक तू इंसान तब ।
न जानती थी फर्क..नर-मादा का तब |
आज मानव जानके भी अनजान क्यूँ ?

जंगल की कंदराओं से निकल..तुम |
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम ।
क्यूँ हो अभी भी ..दानव इतने तुम !
अत्याचार ये..इतने वीभत्स वार क्यूँ ?
-अलका गुप्ता 'भारती'