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Saturday, May 25, 2019

मोहक तस्वीर बदल दोगे...अदम गोंड़वी

गर चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे
 क्या इनसे किसी कौम की तक़दीर बदल दोगे

 जायस से वो हिन्दी की दरिया जो बह के आई
 मोड़ोगे उसकी धारा या नीर बदल दोगे

 जो अक्स उभरता है रसख़ान की नज्मों में
 क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे

 तारीख़ बताती है तुम भी तो लुटेरे हो
 क्या द्रविड़ों से छीनी जागीर बदल दोगे
-- अदम गोंडवी

Saturday, March 16, 2019

उन्हें बुरी लगती हैं......भावना मिश्रा

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उन्हें बुरी लगती हैं आलसी औरतें
मिट्टी के लोंदे-सी पड़ी
उन्हें बुरी लगती हैं
कैंची की तरह जबान चलाती औरतें
जिनके बोलने से घुलने लगता है कानों में पिघला शीशा

उन्हें बुरी लगती हैं
प्रतिरोध करने वाली औरतें
जैसे खो चुकी हों
सारे स्त्रियोचित गुण

छोटे कपड़े पहनने वाली औरतें
भी उन्हें बुरी लगती हैं
कि जिस्म उघाड़ती फिरती हैं

दुनिया भर में
लेकिन..
उन्हें सबसे ज्यादा बुरी लगती हैं वे औरतें
जो उघाड़ कर रख देती हैं अपनी आत्मा को
न सिर्फ घर में
बल्कि घर से बाहर,

देश, समाज और दुनिया के मुंह पर
खोल के रख देती हैं दोमुँही रवायतों की कलई
इसलिए तो दुनिया का कोई भी सभ्य समाज
नहीं निरस्त करता सनी लियोन का वीज़ा
लेकिन तसलीमा का वीज़ा निरस्त होता है हर समाज में

हर देश और समाज से निष्कासित हैं
कितनी ही तसलीमा
-भावना मिश्र
काव्यधरा

Wednesday, February 13, 2019

प्रेम....भगवतीचरण वर्मा

बस इतना--अब चलना होगा
फिर अपनी-अपनी राह हमें।

कल ले आई थी खींच, आज
ले चली खींचकर चाह हमें
तुम जान न पाईं मुझे, और
तुम मेरे लिए पहेली थीं;

पर इसका दुख क्या? मिल न सकी
प्रिय जब अपनी ही थाह हमें।

तुम मुझे भिखारी समझें थीं,
मैंने समझा अधिकार मुझे
तुम आत्म-समर्पण से सिहरीं,
था बना वही तो प्यार मुझे।

तुम लोक-लाज की चेरी थीं,
मैं अपना ही दीवाना था
ले चलीं पराजय तुम हँसकर,
दे चलीं विजय का भार मुझे।

सुख से वंचित कर गया सुमुखि,
वह अपना ही अभिमान तुम्हें

अभिशाप बन गया अपना ही
अपनी ममता का ज्ञान तुम्हें
तुम बुरा न मानो, सच कह दूँ,
तुम समझ न पाईं जीवन को

जन-रव के स्वर में भूल गया
अपने प्राणों का गान तुम्हें।

था प्रेम किया हमने-तुमने
इतना कर लेना याद प्रिये,
बस फिर कर देना वहीं क्षमा
यह पल-भर का उन्माद प्रिये।

फिर मिलना होगा या कि नहीं
हँसकर तो दे लो आज विदा
तुम जहाँ रहो, आबाद रहो,
यह मेरा आशीर्वाद प्रिये।
- भगवतीचरण वर्मा

Friday, February 8, 2019

चाँद मिलता न राह में...गौतम राजऋषी

तू जो मुझसे जुदा नहीं होता
मैं ख़ुदा से खफ़ा नहीं होता

ये जो कंधे नहीं तुझे मिलते
तू तो इतना बड़ा नहीं होता

चाँद मिलता न राह में उस रोज
इश्क़ का हादसा नहीं होता

पूछते रहते हाल-चाल अगर
फ़ासला यूं बढ़ा नहीं होता

छेड़ते तुम न गर निगाहों से
मन मेरा मनचला नहीं होता

होती हर शै पे मिल्कियत कैसे
तू मेरा गर हुआ नहीं होता

कहती है माँ, कहूँ मैं सच हरदम
क्या करूँ, हौसला नहीं होता
-गौतम राजऋषि
काव्य धरा

Friday, January 18, 2019

इक बार कहो तुम मेरी हो ..............इब्ने इंशा


हम घूम चुके बस्ती-बन में

इक आस का फाँस लिए मन में
कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो
जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो।

जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो।

हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में
कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो।

क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो।
~इब्ने इंशा

काव्य धरा





Wednesday, January 2, 2019

मैं कब कहता हूँ .......बशीर बद्र

गूगल से साभार 
मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है


खुदा इस शहर को महफ़ूज़ रखे
ये बच्चो की तरह हँसता बहुत है


मैं हर लम्हे मे सदियाँ देखता हूँ
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है


मेरा दिल बारिशों मे फूल जैसा
ये बच्चा रात मे रोता बहुत है


वो अब लाखों दिलो से खेलता है
मुझे पहचान ले, इतना बहुत है
- बशीर बद्र