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Tuesday, January 23, 2018

सखि, वसन्त आया....सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’


सखि, वसन्त आया।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी-पिक-स्वर
नभ सरसाया।

लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर,
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छूटे
स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया।

-सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’