आँखों में मेरे एक सपना है,
दिल कहता है वो मेरा अपना है.
ख्वाब में जलता हूँ मैं जिसके लिए,
आज फिर उसे सरे राह तकना है.
रोज़ रोज़ की शरारतें खुद से ही,
अब खुद से ही बच निकलना है.
मैं डर जाता हूँ परछाई देखकर,
इस अंधेरे को भी मुझे छलना है
सारे आईने तोड़ दिए हैं मैंने,
क़दमों को फूँक फूँक के चलना है.
गुलाबों से ख़ुशबूँ आती नहीं है,
किताबों को भी अब संभलना है।
ज़िंदगी सूरज की मोहताज नहीं,
शाम से कहो मुझे अब ढलना है
-यश-
