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Tuesday, December 15, 2020

नेज़ों पे दौड़ने का हुनर ढूंढता रहा ....सचिन अग्रवाल



नेज़ों पे दौड़ने का हुनर ढूंढता रहा
हमको हमारे बाद सफ़र ढूंढता रहा..

जब साथ थे तो संजीदा वो ही था और न मैं
वो मुझको और मैं उसको मगर ढूंढता रहा..

सूरज ख़रीद डाले हैं लोगों ने और मैं
ताउम्र जुगनुओं में सहर ढूंढता रहा..

होने को यूं तो नाम वसीयत में था मगर
एक बाप अपना लख्ते जिगर ढूंढता रहा..

अफ़वाह में वो आंच थी अखबार जल गए
मैं इश्तिहारों में ही ख़बर ढूंढता रहा ......

ये देखिये कि कितनी थी शिद्दत तलाश में
मत पूछिए मैं किसको किधर ढूंढता रहा .

(क़तरा से)
- सचिन अग्रवाल

Thursday, January 4, 2018

फ़स्ल काँटों की पहले आती है....सचिन अग्रवाल

ज़ुल्म पर जब शबाब आएगा
देखना इंक़लाब आएगा

उसकी ज़िद है तो टूट जाने दे
कल कोई और ख़्वाब आएगा

मौत! डर इसलिए भी लगता है
उम्र भर का हिसाब आएगा

इन अंधेरे को कौन समझाए
सुबह फिर आफ़ताब आएगा

फ़स्ल काँटों की पहले आती है
तब कहीं इक गुलाब आएगा
-सचिन अग्रवाल
नए मरासिम से

Saturday, July 4, 2015

दौलत तो दुनिया छोड़ जाती है ...................सचिन अग्रवाल



बहुत कुछ ज़िन्दगी चेहरे पे लिक्खा छोड़ जाती है
कि आंधी जैसे कोई गाँव उजड़ा छोड़ जाती है

तुम इन रंगीनियों के बाद का भी सोचकर रखना
हो कितनी खूबसूरत शाम अँधेरा छोड़ जाती है 

कई शाहों के सर सजदे में झुकते हैं मज़ारों पर
फ़क़ीरी जाते जाते भी ये रूतबा छोड़ जाती है

तो फिर क्यूँ चहचहाहट बोझ लगती है ज़माने को
विदा के वक़्त तिनके तक तो चिड़िया छोड़ जाती है

हुनर को वक़्त लगता है बहुत मायूस होने में
यूँ ही थोड़ी कोई मजबूरी क़स्बा छोड़ जाती है

नहीं कोई और ही होगा वो औरत के लिबादे में
कभी माँ भी सड़क पर अपना बच्चा छोड़ जाती है

महज़ कह देने से क्या वक़्त सब ज़ख्मों को भर देगा
तवाइफ़ उम्र ढलने पर क्या कोठा छोड़ जाती है

मज़ा तो तब है कोई खुद को ही जब छोड़ कर जाए
ये गाडी, घर, ज़मीं, दौलत तो दुनिया छोड़ जाती है 

(नए मरासिम में प्रकाशित)

-सचिन अग्रवाल

Saturday, September 27, 2014

जो मेहँदी से कट गयी.........सचिन अग्रवाल


मेहनतकशों की सख्त हथेली से कट गयी
दीवार जो कुंए की थी रस्सी से कट गयी 

क्या ज़ायका है खून का अपने को क्या पता
अपनी तो सूखी रोटी से चटनी से कट गयी 

अंदाजा है तुम्हे कि किसी का थी वो नसीब
हाथों की एक लक़ीर जो मेहँदी से कट गयी

तन्हाई,जख्म माज़ी के और कोई धुंधली याद
एक सर्द रात गीली अंगीठी से कट गयी

मर्ज़ी से अपनी मरने का मौका भी कब मिला
और ज़िन्दगी भी औरों की मर्ज़ी से कट गयी

( नए मरासिम में प्रकाशित)

-सचिन अग्रवाल