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Friday, August 3, 2018

फन्दा............लक्ष्मीनारायण गुप्त


कुछ मुसीबतें, कुछ परेशानियाँ
ऐसी होती हैं जो फन्दे की तरह
गले पर पड़ जाती हैं
जितना प्रयत्न करो निकलने का
फन्दा उतना ही और कसता जाता है

ज़्यादा से ज़्यादा तुम यह कर सकते हो
कि फन्दे को स्वीकार कर लो
अंगीकार कर लो
शिव की तरह विष पान कर लो
फन्दा अब तुम्हारे जीवन की हक़ीकत है

जैसे तुम कारागार में सजा काट रहे हो
इस सजा की कोई अवधि नहीं है
या तो कोई चमत्कार होगा
जो तुम्हें मुक्त करेगा
या फिर यह काम यमराज करेंगे

दिक्कत यह है कि
फन्दा कभी स्वाभाविक नहीं हो पाता
बन्धन हमेशा बन्धन ही रहता है
इस लिए निकलने का व्यर्थ प्रयत्न
अविरल ज़ारी रहता है

फन्दा शाश्वत है
नियति है, प्रकृति है
तुम इससे पशु की तरह बँधे हो
मुक्त होने का प्रयास व्यर्थ है
बस आराम से चारा खाओ


-लक्ष्मीनारायण गुप्त
-१ अगस्त, २०१८

Friday, May 25, 2018

चकल्लस...लक्ष्मीनारायण गुप्त

कभी सोचता हूँ
यह सारी चकल्लस
छोड़के दुनिया से
संन्यास ले लूँ

लेकिन क्या इससे
कोई फरक पड़ेगा
संन्यासी अपनी पुरानी
अस्मिता को नकार देता है
अपना ही श्राद्ध कर देता है

लेकिन फिर नया नाम लेता है
नई अस्मिता शुरू करता है
और वही मुसीबतें
वही चकल्लस फिर 
शुरू हो जाती हैं

पहले लाला सोहनलाल को
अपनी दूकान चलानी होती थी
अब सोहनानंद भारती को
अपना आश्रम चलाना होता है

जब तक ज़िन्दगी है
तब तक चकल्लस भी है
इस लिए जो भी कर रहे हो
करते रहो, करते रहो


-लक्ष्मीनारायण गुप्त
—-२२ मई, २०१८

Thursday, February 8, 2018

पागल मन....लक्ष्मीनारायण गुप्त


शराब है, मस्ती है, बेफ़िक्री है
मगर साकी नहीं पास है
बिन साकी के शराब पीने में
न मज़ा है, न हुलास है

साकी को देखा तो नीयत बदल गई
क्या कहूँ मेरी तक़दीर बिगड़ गई
साकी को यह बात बताऊँ कैसे
ना सुनने की हिम्मत मैं कर पाऊँ कैसे


पागल मन की बात बताऊं कैसे
नामुमकिन को मुमकिन कर पाऊँ कैसे
तू ही बता तुझे मैं पाऊँ कैसे
दीवाने दिल की प्यास बुझाऊँ कैसे

नहीं बताने की हिम्मत है मुझमें
पर नज़र मिलाना चाहूँगा मैं तुझसे
किस अदा से तू शराब ढालती प्याले में
मज़ा आगया तुझसे नज़र मिल जाने में

पागल मन को समझाता हूँ
पाने की उम्मीद छोड़, तू हारा
नज़र मिल गई, क़िस्मत अच्छी
क्या यह कम है यारा

-लक्ष्मीनारायण गुप्त