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Saturday, December 19, 2020

उसकी जुल्फों का था साया दोस्तों ..नवीन मणि त्रिपाठी

हासिल ग़ज़ल 

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कर   के  वादा  वो   निभाया  दोस्तो ।

बा  वफ़ा   फिर  याद  आया  दोस्तो ।।


वो  नज़र  पढ़  कर  गयी  जब से मुझे ।

नूर   रुख़   पर  लौट  आया  दोस्तो ।।


हैं   बहुत  मग़रूर  जानां  हुस्न   पर ।

आइना    किसने   दिखाया    दोस्तो ।।


अब  मुहब्बत  है   ज़रूरी  मुल्क   में ।

मत   कहो  अपना   पराया   दोस्तो ।।


इश्क़  में  मत  पूछना  ये  बात   अब ।

दिल ने कितना ज़ख्म खाया दोस्तो ।।


हाले  दिल  की  है ख़बर  सबको  यहां ।

किसने   कितना  है  रुलाया  दोस्तो ।।


बाद   मुद्दत   मैक़दे   में  आज   फिर ।

मुझको    साकी   ने  पिलाया  दोस्तो ।।


चीज़  क्या  है  मैकशी   समझा  तभी ।

जब  लबों  तक  जाम  लाया  दोस्तो ।।


ख़ुद  को  बस  तन्हा  ही पाया  भीड़ में ।

जब   भी   तुमको  आजमाया  दोस्तो ।।


चांदनी  रोशन  हुई   महफ़िल   में  तब।

चाँद   जब   भी   मुस्कुराया   दोस्तो ।।


दिन   अंधेरी   रात   सा  लगने    लगा ।

उसकी जुल्फों  का था साया दोस्तों ।। 

-नवीन मणि त्रिपाठी

Saturday, April 18, 2020

दरीचे से वो जब भी झांकता है ...नवीन मणि त्रिपाठी

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निगाहों से हुई कोई ख़ता है ।
जो दिल तुझसे वो तेरा मांगता है ।।

रवानी जिस मे होती है समंदर ।
उसी दरिया से रिश्ता जोड़ता है ।।

हमारी ज़िन्दगी को रफ्ता रफ्ता ।
कोई सांचे में अपने ढालता है ।।

तुम्हारे हुस्न के दीदार ख़ातिर ।
यहाँ शब भर ज़माना जागता है ।।

कभी तुम हिचकियों से पूछ तो लो ।
तुम्हे अब कौन इतना चाहता है ।।

ठहर जाती हैं नज़रें बस वहीँ पर ।
दरीचे से वो जब भी झांकता है ।।

बरसने की जवां होती है ख्वाहिश ।
ये बादल जब ज़मीं को देखता है ।

नहीं सँभलेगा उससे दिल हमारा ।
जो डोरे रोज़ हम पर डालता है ।।

यकीनन वाम पे उतरेगा चंदा ।
वो हाले दिल हमारा जानता है ।।

न जाने कैसी है ये कहकशां भी।
सितारा हो के रुस्वा टूटता है ।।

मुक़द्दर जब बुरा होता है यारो ।
कोई अपना कहाँ पहचानता है ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी

Wednesday, April 8, 2020

देखा है किस निगाह से ...नवीन मणि त्रिपाठी

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सब लोग मुन्तज़िर है वहाँ माहताब के ।
चेहरे पढ़े गए हैं जहाँ इज़्तिराब के ।।

छुपता कहाँ है इश्क़ छुपाने के बाद भी ।
होने लगे हैं शह्र में चर्चे ज़नाब के ।।

दौलत के नाम पर वही भटके हुए मिले ।
किस्से सुना रहे थे जो मुझको सराब के ।।

बदला ज़माना है या मुकद्दर खराब है ।
मिलते नहीं हैं यार भी अपने हिसाब के ।।

साज़िश रची गयी है वहीं देश के ख़िलाफ़ ।
नारे जहाँ लगे थे कभी इंकलाब के ।।

साकी उसे पिलाने की ज़िद कर न बारहा ।
जो जी रहा है मुद्दतों से बिन शराब के ।।

नाज़ ओ नाफ़ासतों से वो मगरूर क्यूँ न हों ।
जब दाम लग रहे हैं सनम के हिज़ाब के ।।

है उनकी खुश्बुओं से मुअत्तर चमन मेरा ।
भेजे थे तुमने फूल जो मुझको ग़ुलाब के ।।

दरिया ए आग इश्क़ है छूना सँभल के तुम ।
जलते दिखे हैं हाथ यहाँ आफ़ताब के ।।

देखा है किस निगाह से हमने तुझे ऐ चाँद ।
जा पढ़ तू मेरे शेर अदब की क़िताब के ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी

Sunday, November 10, 2019

मुखौटे बदल के देखते हैं ...नवीन मणि त्रिपाठी


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न पूछिये कि वो कितना सँभल के देखते हैं ।
शरीफ़ लोग मुखौटे बदल के देखते हैं ।।

अज़ीब तिश्नगी है अब खुदा ही खैर करे ।
नियत से आप भी अक्सर फिसल के देखते हैं ।।

पहुँच रही है मुहब्बत की दास्ताँ उन तक ।
हर एक शेर जो मेरी ग़ज़ल के देखते हैं ।।

ज़नाब कुछ तो शरारत नज़र ये करती है ।
यूँ बेसबब ही नहीं वो मचल के देखते हैं ।।

गुलों का रंग इन्हें किस तरह मयस्सर हो ।
ये बागवान तो कलियां मसल के देखते हैं ।।

ज़मीर बेच के जिंदा मिले हैं लोग बहुत ।
तुम्हारे शह्र में जब भी टहल के देखते है ।।

न जाने क्या हुआ जो बेरुख़ी सलामत है ।
हम उनके दिल के जरा पास चल के देखते हैं ।।

ये इश्क़ क्या है बता देंगे तुझको परवाने ।
जो शम्मा के लिए हर शाम जल के देखते हैं ।।

हुआ है हक़ पे बहुत जोर का ये हंगामा ।
गरीब क्यूँ यहाँ सपने महल के देखते हैं ।।

बचाएं दिल को सियासत की साज़िशों से अब ।
ये लीडरान मुहब्बत कुचल के देखते हैं ।।

वही गए हैं बुलंदी तलक यहां यारो ।
जो अपने वक्त के सांचे में ढल के देखते हैं ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Monday, October 30, 2017

आज की रात किधर जाएंगे.........नवीन मणि त्रिपाठी

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चाँद बनकर वो निखर जाएंगे ।
शाम होते ही सँवर जाएंगे ।।

मुझको मालूम है फ़ितरत उनकी ।
हैं जिधर आप उधर जाएंगे ।।

जख्म परदे में ही रखना अच्छा ।
देखकर लोग सिहर जाएंगे ।।

छेड़िये मत वो कहानी मेरी ।
दर्द मेरे भी उभर जाएंगे ।।

घूर कर देख रहे हैं क्या अब ।
आप नजरों से उतर जाएंगे।।

वक्त रुकता नहीं है दुनिया में ।
दिन हमारे भी सुधर जाएंगे ।।

क्या पता था कि जुदा होते ही ।
इस तरह आप बिखर जाएंगे ।।

ये मुहब्बत है इबादत मेरी ।
एक दिन दिल मे ठहर में जाएंगे ।।

इश्क़ पर बात अभी क्या करना ।
इश्क पर आप मुकर जाएंगे ।।

जिद मुनासिब कहाँ है पीने की ।
आप तो हद से गुजर जाएंगे ।।

बज्म में आ गए तो रुकिए भी।
आज की रात किधर जाएंगे ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Sunday, September 10, 2017

रहमतों से फ़ासला हो जाएगा.....नवीन मणि त्रिपाठी

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मत कहो हमसे जुदा हो जाएगा ।
वह मुहब्बत में फ़ना हो जाएगा ।।

इश्क के इस दौर में दिल आपका ।
एक दिन मेरा पता हो जाएगा ।।

धड़कनो के दरमियाँ है जिंदगी ।
धड़कनो का सिलसिला हो जाएगा ।।

इस तरह उसने निभाई है कसम ।
वह हमारा देवता हो जाएगा ।।

ऐ दिले नादां न कर मजबूर तू ।
वो मेरी ज़िद पर ख़फ़ा हो जाएगा ।।

पत्थरो को फेंक कर तुम देख लो ।
आब का ये कद बड़ा हो जाएगा ।।

मत निकलिए इस तरह से बेनकाब ।
फिर चमन में हादसा हो जाएगा ।।

अब अना से बढ़ रहीं नज़दीकियां ।
रहमतों से फ़ासला हो जाएगा ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी

Tuesday, August 29, 2017

कातिलाना वार करती वो अदा.....नवीन मणि त्रिपाठी

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वो तेरा छत पर बुलाकर रूठ जाना फिर कहाँ ।
वस्ल के एहसास पर नज़रें चुराना फिर कहाँ ।।

कुछ ग़ज़ल में थी कशिश कुछ आपकी आवाज थी ।
पूछता ही रह गया अगला तराना फिर कहाँ ।।

आरजू के दरमियाँ घायल न हो जाये हया ।
अब हया के वास्ते पर्दा गिराना फिर कहाँ ।।

कातिलाना वार करती वो अदा भूली नहीं ।
शह्र में चर्चा बहुत थी अब निशाना फिर कहाँ ।।

तोड़ते वो आइनों को बारहा इस फिक्र में । 
लुट गया है हुस्न का इतना खज़ाना फिर कहाँ ।।

था बहुत खामोश मैं जज़्बात भी खामोश थे ।
पढ़ लिया उसने मेरे दिल का फ़साना फिर कहाँ ।।

खो गए थे इस तरह हम भी किसी आगोश में ।
याद आया वो ज़माना पर ठिकाना फिर कहाँ ।।

उम्र की दहलीज पर यूँ ही बिखरना था मुझे ।
वो लड़कपन ,वो जवानी, दिन पुराना फिर कहाँ ।।

ढल चुकी हैं शोखियाँ अब ढल चुके अंदाज भी ।
अब हवाओं में दुपट्टे का उड़ाना फिर कहाँ ।।

हुस्न की जागीर पर रुतबा था उसका बेमिशाल।
झुर्रियों की कैद में अब भाव खाना फिर कहाँ ।।

मैकदों के पास जब ग़ुज़रा तो ये आया खयाल ।
सरबती आंखों से अब पीना पिलाना फिर कहाँ ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Monday, July 20, 2015

फिर दबा लिया गम को..............नवीन मणि त्रिपाठी



ख्वाहिशे चाँद ने यूँ ही बुला लिया हमको।
मेरी नज़र से कोई दूर कर लिया तुमको।।

ईद का जश्न मनाना मेरी मजबूरी थी।
बड़ी खामोशियों से फिर दबा लिया गम को।।

या इलाही तेरी मगरूरियत भी जालिम है ।
मेरे जख्मो का अफ़साना सुना लिया उनको ।।

तेरी पनाह में मुमकिन थी जिंदगी अपनी।
दौरे मुफ़लिस में था मैंने भुला लिया रब को ।।

यहाँ इबादतों पे , बददुआ ही हासिल है ।
उसके सज़दे ने फिर हैरत में ला दिया सबको।।

मेरा यकीन भी किस्मत का गुनहगार बना।
मेरी वजह से क्यों तुमने मिटा लिया खुदको।।

थी तमन्ना कि मेरा चाँद निकल आएगा ।
बेरहम बादलों ने फिर चुरा लिया उसको ।।

--नवीन मणि त्रिपाठी