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Tuesday, January 2, 2018

एक सौदा था जिसने सर छोड़ा....शीन काफ़ निज़ाम

अक्स ने आईने का घर छोड़ा
एक सौदा था जिसने सर छोड़ा

भागते मंज़रों ने आंखों में
ज़िस्म को सिर्फ़ आंख भर छोड़ा

हर तरफ़ रोशनी फैल गई
सांप ने जब खंडहर छोड़ा

धूल उड़ती है धूप बैठी है
ओस ने आंसुओं का घर छोड़ा

खिड़कियाँ पीटती है सर शब भर
आखिरी फ़र्द ने भी घर छोड़ा

क्या करोगा निज़ाम रातों में
ज़ख़्म की याद ने अगर छोड़ा
-शीन काफ़ निज़ाम

Wednesday, October 11, 2017

क्या है मुझ में............नौबहार 'साबिर'

बूंदी पानी की हूं थोड़ी-सी हवा है मुझ में
इस बिज़ाअत पे भी क्या तुर्फ़ां इना है मुझ में

ये जो इक हश्र शबो-रोज़ बपा है मुझ में
हो न हो और भी कुछ मेरे सिवा है मुझ में

सफ़्हे-दहर पे इक राज़ की तहरीर हूं मैं
हर कोई पढ़ नहीं सकता जे लिखा है मुझ में

कभी शबनम की लताफ़त कभा शो'ले की लपक
लम्हा-लम्हा ये बदलता हुआ क्या है मुझ में

शहर का शहर हो जब अर्सए-मशहर की तरह
कौन सुनता है जो कुहराम मचा है मुझ में

वक्त ने कर दिया 'साबिर' मुझे सहरा-ब-किनार
इक ज़माने में समुंदर भी बहा हो मुझ में
- नौबहार 'साबिर'
शब्दार्थः
बिज़ाअत -पूंजी, तुर्फ़ां -विचित्र,  इना -अहं, हश्र -प्रलय, 
शबो-रोज़ -रात-दिन, बपा -मचा हुआ, सफ़्हे-दहर -संसार रूपी पन्ने, तहरीर -लेख, लताफ़त -कोमलता, अर्सए-मशहर -प्रलय क्षेत्र, 
सहरा-ब-किनार - मरुस्थल के अंक में