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Friday, September 13, 2019

भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है....कविता रावत


पहनने वाला ही जानता है जूता कहाँ काटता है
जिसे कांटा चुभे वही उसकी चुभन समझता है !



पराये दिल का दर्द अक्सर काठ का लगता है

पर अपने दिल का दर्द पहाड़ सा लगता है !



अंगारों को झेलना चिलम खूब जानती है

समझ तब आती है जब सर पर पड़ती है !



पराई दावत पर सबकी भूख बढ़ जाती है

अक्सर पड़ोसी मुर्गी ज्यादा अण्डे देती है !



अपने कन्धों का बोझ सबको भारी लगता है

सीधा  आदमी  पराए  बोझ  से दबा रहता है !



पराई चिन्ता में अपनी नींद कौन उड़ाता है

भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है !



लेखिका - कविता रावत