पहनने वाला ही जानता है जूता कहाँ काटता है
जिसे कांटा चुभे वही उसकी चुभन समझता है !
पराये दिल का दर्द अक्सर काठ का लगता है
पर अपने दिल का दर्द पहाड़ सा लगता है !
अंगारों को झेलना चिलम खूब जानती है
समझ तब आती है जब सर पर पड़ती है !
पराई दावत पर सबकी भूख बढ़ जाती है
अक्सर पड़ोसी मुर्गी ज्यादा अण्डे देती है !
अपने कन्धों का बोझ सबको भारी लगता है
सीधा आदमी पराए बोझ से दबा रहता है !
पराई चिन्ता में अपनी नींद कौन उड़ाता है
भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है !
लेखिका - कविता रावत
