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Friday, January 4, 2019

क्षणिकाएँ....श्वेता सिन्हा

ख्वाहिशें
रक्तबीज सी
पनपती रहती है
जीवनभर,
मन अतृप्ति में कराहता
बिसूरता रहता है
अंतिम श्वास तक।

--*--*--

मौन
ब्रह्मांड के कण कण
में निहित।
अभिव्यक्ति
होठों से कानों तक
सीमित नहीं,
अंतर्मन के
विचारों के चिरस्थायी शोर में
मौन कोई नहीं हो सकता है।

--*--*--

दुख
मानव मन का
स्थायी निवासी है
रह रह कर सताता है
परिस्थितियों को
मनमुताबिक
न देखकर।

--*--*--

बंधन
हृदय को जोड़ता
अदृश्य मर्यादा की डोर है।
प्रकृति के नियम को
संतुलित और संयमित
रखने के लिए।

--*--*--

दर्पण
छलावा है
सिवाय स्वयं के
कोई नहीं जानता
अपने मन के
शीशे में उभरे
श्वेत श्याम मनोभावों को।

--*--*--
-श्वेता सिन्हा



Tuesday, January 1, 2019

सदा तुम्हारी...श्वेता सिन्हा

तन्हाई में बिखरी खुशबू ए हिना तेरी है
वीरान खामोशियों से आती सदा तेरी है

टपक टपक कर भरता गया दामन मेरा
फिर भी खुशियों की माँग रहे दुआ तेरी है

अच्छा बहाना बनाया हमसे दूर जाने का
टूट गये हम यूँ ही या काँच सी वफा तेरी है

सुकून बेचकर ग़म खरीद लाये है तुमसे
लगाया था बाज़ार इश्क का ख़ता तेरी है

वक्त की शाख से टूट रहे है यादों के पत्ते
मौसम पतझड़ नहीं बेरूखी की हवा तेरी है

-श्वेता सिन्हा
मूल रचना

Wednesday, December 12, 2018

सुबह की पलकों पे शबनमी क़तरे ...........श्वेता सिन्हा

दो दिन का इश्क़
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मेरी तन्हाइयों में 
 तुम्हारा एहसास 
कसमसाता है, 
तुम धड़कनों में 
लिपटे हो 
मेरी साँसें बनकर।
बेचैन वीरान 
साहिल पे बिखरा 
कोई ख़्वाब,
लहर समुन्दर की 
पलकों को 
नमकीन करे। 

सोचा न सोचूँ तुम्हें 
ज़ोर  ख़्यालों  पर 
 कैसे हो,
तुम फूल की ख़ुशबू 
 भँवर मन 
मेरा बहकता है। 

दो दिन का 
तेरा इश्क़ सनम 
दर्द ज़िंदगीभर का,
फ़लसफ़ा  
मोहब्बत का 
समझ न आया हमको।

शिशिर 
रात की आग़ोश  में  
संग चाँदनी के  
ख़ूब रोया दिल,
सुबह की पलकों पे 
शबनमी क़तरे 
 गवाही देते। 

-श्वेता सिन्हा

Tuesday, December 4, 2018

ख़ामोशी की साँस....श्वेता सिन्हा

ख्याल
साँझ की
गुलाबी आँखों में,
डूबती,फीकी रेशमी
डोरियों के
सिंदूरी गुच्छे,
क्षितिज के कोने के
स्याह कजरौटे में
समाने लगे,
दूर तक पसरी
ख़ामोशी की साँस,
जेहन में ध्वनित हो,
एक ही तस्वीर
उकेरती है,
जितना  झटकूँ
उलझती है
फिसलती है आकर
पलकों की राहदारी में
ख्याल बनकर।
-श्वेता सिन्हा
मूल रचना

Sunday, December 2, 2018

पत्थर के शहर में....श्वेता सिन्हा

पत्थर के शहर में शीशे का मकान ढूँढ़ते हैं।
मोल ले जो तन्हाइयाँ ऐसी एक दुकान ढूँढ़ते हैं।।

हर बार खींच लाते हो ज़मीन पर ख़्वाबों से,
उड़ सकें कुछ पल सुकूं के वो आसमां ढूँढ़ते हैं।।

बार-बार हक़ीक़त का आईना क्या दिखाते हो,
ज़माने के सारे ग़म भुला दे जो वो परिस्तां ढूँढ़ते हैं।।

जीना तो होगा ही जिस हाल में भी जी लो,
चंद ख़ुशियों की चाह लिए पत्थर में जान ढूँढ़ते हैं।।

ठोकरों में रखते हैं हरेक ख़्वाहिश इस दिल की,
उनकी चौखट पे अपने मरहम का सामान ढूँढ़ते हैं।।

    -श्वेता सिन्हा


Monday, November 26, 2018

सूरज तुम जग जाओ न.....श्वेता सिन्हा

धुँधला धुँधला लगे है सूरज
आज बड़ा अलसाये है
दिन चढ़ा देखो न  कितना
क्यूँ न ठीक से जागे है
छुपा रहा मुखड़े को कैसे
ज्यों रजाई से झाँके है

कुछ तो करे जतन हम सोचे
कोई करे उपाय है
सूरज को दरिया के पानी मे
धोकर आज सुखाते है
चमचम फिर से चमके वो
वही नूर ले आते है

सब जन ठिठुरे उदास है बैठे
गुनगुनी धूप भर जाओ न
देकर अपनी मुस्कान सुनहरी
कलियों के संग गाओ न
नील गगन पर दमको फिर से
संजीवन तुम भर जाओ न
मिलकर धरती करे ठिठोली
सूरज तुम जग जाओ न
- श्वेता सिन्हा


Saturday, November 24, 2018

तन्हा चाँद जाने किस ख़्याल में गुम है.....श्वेता सिन्हा

सर्द रात की 
नम आँचल पर
धुँध में लिपटा
 तन्हा चाँद
जाने किस
ख़्याल में गुम है
झीनी चादर
बिखरी चाँदनी
लगता है 
किसी की तलाश है
नन्हा जुगनू 
छूकर पलकों को
देने लगा 
हसीं कोई ख़्वाब है
ठंडी हवाएँ भी
पगलाई जैसे
चूमकर  आयीं  
 तेरा हाथ हैं 
सिहरनें  तन की 
भली लग रहीं 
गरम दुशाला लिए 
कोई याद है
असर मौसम का 
या दिल मुस्काया
लगे फिर 
चढ़ा ख़ुमार है
सितारे आज 
बिखरने को आतुर
आग़ोश  में आज 
मदहोश रात है

 -श्वेता सिन्हा


Wednesday, November 21, 2018

तेरे नेह में....श्वेता सिन्हा

तुमसे मिलकर कौन सी बातें करनी थी मैं भूल गयी
शब्द चाँदनी बनके झर गये हृदय मालिनी फूल गयी

मोहनी फेरी कौन सी तुमने डोर न जाने कैसा बाँधा
तेरे सम्मोहन के मोह में सुध-बुध जग भी भूल गयी

मन उलझे मन सागर में लहरों ने लाँघें तटबंधों को
सारी उमर का जप-तप नियम पल-दो-पल में भूल गयी

बूँदे बरसी अमृत घुलकर संगीत शिला से फूट पड़े
कल-कल बहती रसधारा में रिसते घावों को भूल गयी

तुम साथ रहो तेरा साथ रहे बस इतना ही चाहूँ तुमसे
मन मंदिर के तुम ईश मेरे तेरे नेह में ईश को भूल गयी

-श्वेता सिन्हा

Monday, November 19, 2018

नन्ही ख़्वाहिश....श्वेता सिन्हा

एक नन्ही ख़्वाहिश 
चाँदनी को अंजुरी में भरने की,
पिघलकर उंगलियों से टपकती
अंधेरे में ग़ुम होती 
चाँदनी देखकर
उदास रात के दामन में
पसरा है मातमी सन्नाटा 
ठंड़ी छत को छूकर सर्द किरणें
जगाती है बर्फीला एहसास
कुहासे जैसे घने बादलों का
काफिला आकर 
ठहरा है गलियों में
पीली रोशनी में
नम नीरवता पाँव पसारती
पल-पल गहराती
पत्तियों की ओट में मद्धिम
फीका सा चाँद
अपने अस्तित्व के लिए लड़ता
तन्हा रातभर भटकेगा 
कंपकपाती नरम रेशमी दुशाला 
 तन पर लिपटाये
मौसम की बेरूखी से सहमे
शबनमी सितारे उतरे हैं
फूलों के गालों पर
भींगी रात की भरी पलकें
सोचती है 
क्यूँ न बंद कर पायी
आँखों के पिटारे में
कतरनें चाँदनी की, 
अधूरी ख़्वाहिशें 
अक्सर बिखरकर 
रात के दामन में 
यही सवाल पूछती हैं।
-श्वेता सिन्हा

Saturday, November 17, 2018

अनायास ही गुम हो जाते हैंं...श्वेता सिन्हा

साँझ को नभ के दालान से
पहाड़ी के कोहान पर फिसलकर
क्षितिज की बाहों में समाता सिंदुरिया सूरज,
किरणों के गुलाबी गुच्छे
टकटकी बाँधें खड़े पेड़ों के पीछे उलझकर
बिखरकर पत्तों पर
अनायास ही गुम हो जाते हैंं,
गगन के स्लेटी कोने से उतरकर
मन में धीरे-धीरे समाता विराट मौन
अपनी धड़कन की पदचाप सुनकर चिंहुकती
अपनी पलकों के झपकने के लय में गुम
महसूस करती हूँ एकांत का संगीत
चुपके से नयनों को ढापती
स्मृतियों की उंगली थामे
मैं स्वयं स्मृति हो जाती हूँ
एक पल स्वच्छंद हो 
निर्भीक उड़कर 
सारा सुख पा लेती हूँ,
नभमंडल पर विचरती चंचल पंख फैलाये
भूलकर सीमाएँ
कल्पवृक्ष पर लगे मधुर पल चखती
सितारों के वन में भटकती
अमृत-घट की एक बूँद की लालसा में
तपती मरुभूमि में अनवरत,
दिव्य-गान हृदय के भावों का सुनती
विभोर सुधि बिसराये
घुलकर चाँदनी की रजत रश्मियों में
एकाकार हो जाती हूँ
तन-मन के बंधनों से मुक्त निमग्न 
सोमरस के मधुमय घूँट पी
कड़वे क्षणों को विस्मृत कर
चाहती हूँ अपने
एकांत के इस उत्सव में
तुम्हारी स्मृतियों का
चिर स्पंदन।

-श्वेता सिन्हा