प्रेम और स्पर्श
मेरे दो बच्चे हैं
स्पर्श कुछ अधिक चंचल है
दौड़ता है दूर-दूर तक
पूछ-पूछ कर
परेशान रखता है
दूसरा- प्रेम, जरा
गम्भीर है
बहुत संकट में ही मां
पुकारता हैऔर अधिकतर समय
खुद ही अपनी
मां बना रहता है।
-अमिता प्रजापति
...... नायिका से
सिंदूर बनकर
तुम्हारे सिर पर
सवार नहीं होना चाहता हूं
न डस लेना चाहता हूं
तुम्हारे कदमों की उड़ान को
चूड़ियों की जंजीर में
नहीं जकड़ना चाहता
तुम्हारी कलाइयों की लय
न मंगल-सूत्र बन
झुका देना चाहता हूं
तुम्हारी उन्नत ग्रीवा
जिसका एक सिरा बंधा रहे
घर के खूंटे से
किसी वचन की बर्फ में
नहीं सोखना चाहता
तुम्हारी देह का ताप
बस आँखों से बीजना चाहता हूं विश्वाश
और दाखिल हो जाना चाहता हूँ
खामोशी से तुम्हारी दुनिया में
जैसे आँखों में दाखिल हो जाती है नींद
जैसे नींद में दाखिल हो जाते हैं स्वप्न
जैसे स्वप्न में दाखिल हो जाती है बेचैनी
और फिर
झिमिलाती रहती है उम्र भर
~अशोक कुमार पाण्डेय
युवा कवि, लेखक, समीक्षक व समालोचक
....नायिका से
पिछले साठ बरसों से
एक सुई और तागे के बीच
दबी हुई है मां
हालांकि वह खुद एक
करघा है
जिस पर साठ बरस बुने
गए हैं
धीरे-धीरे तह पर तह
खूब मोटे और गझिन और
खुरदरे
साठ बरस
-केदारनाथ सिंह
.... नायिका से
तुम्हारी जिव्हा
ठांव-कुठांव टपकाती है लार
इसे काबू में रखना तुम्हारे वश में कहां
तुमने चख लिया हर रंग का लहू
परन्तु एक बार आओ
मेरी राम रसोई में
अग्नि केवल तुम्हारे जठर में
नहीं, मेरे चूल्हे में भी है
ये पृथ्वी स्वयं हांडी बनकर
खदबदा रही है
केवल द्रौपदियों को ही
मिलती है यह हांडी
पांच पतियों के
परम सखा से
- अजन्ता देव
..... नायिका से...