
गीत धड़कन से निकल
कर्कश हुये
टकरा ग़मों से,
आग की बरसात हुई।
बदक़िस्मत!
ख़ुदा तक पहुंच कर,
लौटी अधूरी मांग
लो! दिल की हमारी;
स्वाद में ऐसा लगा,
चाश्नी में किस तरह
नीम कड़ुवे की शुमारी।
ठोक माथा-मुँह छिपा रोये,
किसी दीवार से लगती
किस्मत जा कहीं सोई।
पेट ख़ाली,
तड़पते हों भूख से पर
ख़्याल में
पकवान ही साधा।
तारों पर नज़र ,
और गड्ढे सड़क पर भरपूर
कैसे दूर हो बाधा?
कंगाली, फटेहाली में, जीते
महल सपनों के
बनाये क्या करे कोई!!
-हरिहर झा