आओ सखी मिल-जुलकर ये गीत गाओ।
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ |
तुम्हारे बिना सूना है घर और यह ऑगन,
उदास है माथे की बिंदिया, शांत है कगन |
सेज काँटों-सा हुआ, ऐसे तो न तड़पाओ,
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ |
अब कमरे में रात गहरी जब भी छाती है
कसम से तुम्हारी याद और ज्यादा आती है
आसुओं से फैलते कजरे को समझाओ
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ |
रात करवटें बदलती अब कट रही है
मगक जेहन से याद तुम्हारी न हट रही है
लगी जो प्यार की अगन इसे तो बुझाओ
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ |
आओ सखी मिल-जुलकर ये गीत गाओ।
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ |
-विनोद सागर
