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Wednesday, August 29, 2018

बैरी सजना ....विनोद सागर

आओ सखी मिल-जुलकर ये गीत गाओ। 
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ | 

तुम्हारे बिना सूना है घर और यह ऑगन, 
उदास है माथे की बिंदिया, शांत है कगन | 
सेज काँटों-सा हुआ, ऐसे तो न तड़पाओ, 
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ | 

अब कमरे में रात गहरी जब भी छाती है
कसम से तुम्हारी याद और ज्यादा आती है
आसुओं से फैलते कजरे को  समझाओ
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ | 

रात करवटें बदलती अब कट रही है
मगक जेहन से याद तुम्हारी न हट रही है
लगी जो प्यार की अगन इसे तो बुझाओ
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ |

आओ सखी मिल-जुलकर ये गीत गाओ। 
बैरी सजना, अब तो सावन में घर आओ | 
-विनोद सागर