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Friday, February 24, 2017

‘ख़ाली पन्ना’....वीणा भाटिया


किताब को पलटते हुए
यकायक ख़ाली पन्ना

बीच में आ गया
प्रिंटिंग की भूल थी
भूल जैसी लगी नहीं
चौंका गया
सुखद अहसास भी दे गया
ख़ाली पन्ना
चुटकी बजा कर जगा गया
ख़ाली पन्ना

चुनौती की तरह हाज़िर हो
सवाल करता
क्या सोच रहे थे ?
आगे क्या सोचा है ?
क्या लक्ष्य है ?
वो सारे सवाल पूछता है
ख़ाली पन्ना

जिनसे हम बचते-बचाते
चाहते हैं निकलना
ना कोई मैदान आए
ना राहों की हक़ीक़त
ना क़दमों की रफ़्तार
ना ही कोई सफ़े का आईना
जो सच पूछे हमसे
ख़ाली पन्ना
मानो…
ट्रेन सरपट भाग रही
पहाड़ों के घने जंगलों का नज़ारा
हरी-घनी छाँव को ठेलता पीला सूरज
बारिश की धूप वाली गर्माहट
सब दिखाता
ख़ाली पन्ना

भरे पन्नों में केवल
हाशिए तलाशे जा सकते हैं
ख़ाली सफ़ों में बड़ी गुंजाइश है
समझाता ख़ाली पन्ना

अंतराल के बाद
सोचने की चुनौती लेकर आया
ख़ाली पन्ना
प्रिंटिंग की भूल नहीं
खुले आसमान का निमंत्रण लगा
ख़ाली पन्ना।
-वीणा भाटिया

Email- vinabhatia4@gmail.com