कहूँ किसको बता यारा सुकूँ दिल को न आता है
करूँ मैं कोशिशें कितनी नहीं ये दिल भुलाता है
हज़ारों राह ढूँढी पर भुलाना है बहुत मुश्किल
बिना सोचे तुझे हमदम नहीं दिल चैन पाता है
जहां के वास्ते मुझको बहुत कुछ सोचना है अब
मगर दिल तो हमेशा ही तुम्हारी राह जाता है
नहीं इसको समझ आये बना अंजान है फिरता
बहुत बेदर्द दिल मेरा मुझे हरदम रुलाता है
नज़ारे तो दिखाता हूँ मगर चुपचाप है बैठा
नहीं ये ख़्वाब कोई भी निग़ाहों में सजाता है
डगर तो ढूँढ ली मैंने मगर बेबस बहुत है दिल
तेरे कूचे से बाहर की नहीं अब राह पाता है
हुआ पागल मेरा दिल तो नहीं है फ़िक्र कुछ इसको
बिखरकर टूटने का डर मगर मुझको सताता है
-सुरेश अग्रवाल "अधीर"
