ज़ुल्म पर जब शबाब आएगा
देखना इंक़लाब आएगा
उसकी ज़िद है तो टूट जाने दे
कल कोई और ख़्वाब आएगा
मौत! डर इसलिए भी लगता है
उम्र भर का हिसाब आएगा
इन अंधेरे को कौन समझाए
सुबह फिर आफ़ताब आएगा
फ़स्ल काँटों की पहले आती है
तब कहीं इक गुलाब आएगा
-सचिन अग्रवाल
नए मरासिम से