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Monday, February 13, 2017

फागुन.... संजय वर्मा 'दृष्ट‍ि'



पहाड़ों पर टेसू ने रंग बिखेरे फागुन में 
हर कदम पर बज रहे ढोल फागुन में
ढोल की थाप पे थिरकते पैर फागुन में
महुआ लगे झुमने गीत सुनाए फागुन में  

बिन पानी खिल जाते टेसू फागुन में 
पानी संग मिल रंग लाते टेसू फागुन में 
रंगों के खेल हो जाते शुरू फागुन में 
दुश्मनी छोड़ दोस्ती के मेल होते फागुन में  

शरमाते जाते हैं सब मौसम फागुन में 
मांग ले जाते प्रेमी कुछ प्यार फागुन में 
हर चहरे पर आ जाती खुशहाली फागुन में 
भगोरिया के नृत्य लुभा जाते फागुन में  

बांसुरी, घुंघरू के संग गीत सुनती फागुन में 
ताड़ों के पेड़ों से बन जाते रिश्ते फागुन में 
शकर के हर-कंगन बन जाते मेहमां फागुन में 
पहाड़ों की सचाई हमसे होती रूबरू फागुन में  

-संजय वर्मा 'दृष्ट‍ि'

Tuesday, November 1, 2016

इंतजार................ संजय वर्मा 'दृष्ट‍ि'




















दुआएं करते हैं 
घर में किलकारी सुनाई दे
जन्म लेता है जब घर में कोई 
तुतलाहट बोली में हम 
हो जाते हैं बच्चों के संग बच्चे 
उन्हें अपने हाव भाव से 
हंसाने का प्रयत्न करते हैं

हर धर्म की मां उसे 
खिलाती /प्यार करती 
और गोदियों में ले जाती कभी इस घर 
कभी उस घर 
इससे हो जाता घरों में सुखद वातावरण  

एक घर में उदास बैठी मां से 
उदासी का कारण पूछा 
तो किसी ने बताया कि -
इनकी बिटिया को क्रूर लोगों ने 
गर्भ में ही मार दिया
जब से उदास है  

सामने घर में खेल रही 
बिटिया में 
अपनी बिटिया का अक्स देखती मां
मन ही मन कहती 
मेरी बिटिया जीवित होती तो 
आ जाती मेरे घर में भी खुशियां 
और हो जाती मेरे चेहरे से 
उदासी काफूर   

खुशिया छीनने 
चेहरे पर उदासी लाने वालों को 
कब कड़ी सजा मिलेगी 
कई मांओं को इसका इंतजार है      



-संजय वर्मा 'दृष्ट‍ि'