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Tuesday, October 21, 2014

अक्स तुम्हारा............राजेन्द्र जोशी





 










मैं उस रात
तम्हारे इन्तजार में
घर की छत पर
आधे चाँद को देखता रहा
तुम्हारी तलाश में
देखता रहा
उस आधे में भी
पूरा अक्स तुम्हारा..


-राजेन्द्र जोशी


.... हेल्थ, पत्रिका से





Friday, October 17, 2014

अंदाज......................राजेन्द्र जोशी



















किया था एक समझौता
तुम्हारे साथ
नजदीक रहने भर का
तुम्हीं से
लेकिन तुम ते
समेट ले गई मुझे ही
आहिस्ता से
हंसती हुई बाहों में
अकेली,
अलहदा अंदाज में
मेरा गहरी सोच के बिना
मेरे रक्त के समंदर में
तैरने लगी
मेरी हर इच्छा
पूरी करती हुई
मछली की तरह।


-राजेन्द्र जोशी
.... हेल्थ, पत्रिका से




Tuesday, September 9, 2014

क्यूं हाथ लगी रुसवाई है..........देव वंश दुबे

 

  
कांटों में जो थोड़ी महक समाई है
फूलों ने ही दरियादिली दिखाई है

हो जाता गुलज़ार फलक पूरे दिल का
हंसती जब कोई कभी रोशनाई है

दुनिया से तो प्यार जताया है लेकिन
ना जाने क्यूं हाथ लगी रुसवाई है

सपनों को साकार बनाऊं फिर कैसे
राहों में पर्वत या फिर खाई है

न करता आंखों से चूमूं दरिया को
करता जो प्यासों की ही अगुआई है

-देव वंश दुबे
...........हेल्थ, पत्रिका से

Wednesday, September 3, 2014

इनायत मत समझ लेना............हबीब कैफी



किसी से हंस के मिलने को मोहब्बत मत समझ लेना
कोई खामोश रहे तो अदावत मत समझ लेना

ये आती है तजुर्बों से, बुजुर्गों से ये मिलती है
किताबों के हवालों को ज़हानत मत समझ लेना

बुलाने से नहीं आते, ख़ुदा भिजवाता है इनको
जो आए घर कोई मेहमां, मुसीबत मत समझ लेना

शिकारी प्यार से दाना दिया करता है पंछी को
शिकारी की मोहब्बत को इनायत मत समझ लेना

जो लटकाता है फ़ांसी पर वो पहले पैर छूता है
किसी के झुक के मिलने को शराफत मत समझ लेना

-हबीब कैफी


प्राप्ति स्रोतः हेल्थ, पत्रिका

Monday, August 18, 2014

छिड़क रहे हैं इत्र लोग.......कलीम अव्वल




कितने मिले विचित्र लोग
वसन फाड़ते मित्र लोग

पत्थर से बैठे गुमसुम
जैसे, बस, हों चित्र लोग

योनाचार-रत संत यहां
फिर, भी, कहें पवित्र लोग

किस पर अब विश्वाश करें
धारे छली चरित्र लोग

फैली है दुर्गंध बहुत
छिड़क रहे हैं इत्र लोग

-कलीम अव्वल

प्राप्ति स्रोतः हेल्थ, पत्रिका

Tuesday, August 12, 2014

दर्द................लता शर्मा




 












न जाने कब से थी
उसे यह शिकायत

मुड़ते न थे घुटने
चलना भी था हिमाकत

जब सीमातीत हो चला दर्द
तो घबराकर बोले घर के मर्द

बुलाओ डॉक्टर ओझा गुनी हकीम
तकलीफ है हमें बेहद

अब यह उठ न सकेगी
चल नहीं सकेगी

झाड़ू-पोछा-खाना-बर्तन
कुछ भी तो न कर सकेगी

बहुत जरूरी है इसका इलाज
वरना कौन करेगा इतने काज

भगवान भी था इसका हमराज
अब नहीं होगा मंदिर का साज

झुक नहीं सकेगी यह
नहीं बैठेगी जानुपात

रखेगी नहीं चरणों में सिर
बिना गति के बेकार है हाथ

आह! जो झुक न सके
चल न सके पीछे-पीछे

आज्ञा मिलने पर, उठ न सके
वह भी क्या औरत जात


-लता शर्मा

स्रोतः हेल्थ...... रविवारीय पत्रिका