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Wednesday, July 24, 2019
Wednesday, March 13, 2019
हरश्रृंगारी महक...अलका गुप्ता

तन - मन भिगो रही आज ...
यादों की हरश्रृंगारी महक ।
अल्हड उन बतियों की चहक ।
ढलकी - ढलकी चितवन ये ।
रूखे अधरों का कंपन ये ।
बिखर गई अलकों में ...
बीते दिनों की राख सी ...
सिमट गई लाली जो ...
झुर्रियों में अनायास ही ...
कसक बहुत रही है आज ।
जो तोड़ ना सके थे कायर हाथ ।
उन बीते दिनों के अनचाहे ...
बंधनों की झूठी लाज ।।
-अलका गुप्ता
Sunday, March 4, 2018
मुखर मेल......अलका गुप्ता
नाट्यकार सा !
जीवन रंग मंच !
शाज मुखौटा !
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मुखर मेल !
सुख-दुखिया खेल !
नकाब पोशी !
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धुनी रमाए !
साधु भए सियार !
छले मुखौटा !
-----------------------
मांजे चेहरे !
पहन शराफ़त !
डाले ये डाँके !
-----------------------
साजें तन क्या !
माटी घट ये चोला !
रूह..बुहारें !
-----------------------
लेने दो साँस !
आत्मा को संस्कार की !
नश्वर तन !
-----------------------
श्वास ले आत्मा !
अक्षय..अमर वो !
तन ये चोला !
टिप्पणी में एक ताँका__
रंग रंग के !
रूप-कुरूप मास्क !
शुभ-अशुभ !
घाव..घने..या हास !!
जीवंत जिएं विलास !!
-अलका गुप्ता
प्राप्ति स्त्रोत्रः
तस्वीर क्या बोले
तस्वीर क्या बोले
Friday, June 9, 2017
तन -मन भिगो रही आज ... अलका गुप्ता
यादों की हरश्रृंगारी महक ।
अल्हड उन बतियों की चहक ।
ढलकी - ढलकी चितवन ये
रूखे अधरों का कंपन ये ।
बिखर गई अलकों में ...
बीते दिनों की राख सी ...
सिमट गई लाली जो ...
झुर्रियों में अनायास ही ...
कसक बहुत रही है आज ।
जो तोड़ ना सके थे कायर हाथ ।
उन बीते दिनों के अनचाहे ...
बंधनों की झूठी लाज ।।
-अलका गुप्ता
Tuesday, June 6, 2017
चंद हाईकू....अलका गुप्ता
बढ़ा तू हाथ !
भूल सारे विषाद !
पीछे से हँसी !
नन्हीं सी ख़ुशी !
हँसेगा सारा जहाँ !
तेरे साथ ही !
जिन्दगी तेरी !
बिताना क्या गमों में !
ढूंढ ले खुशी !
कर श्रृंगार !
हृदय गुलाब से !
सहज कर !
नियामत है !
तोहफ़ा है जिन्दगी !
है बंदगी भी !
Saturday, June 3, 2017
Wednesday, May 17, 2017
इतने वीभत्स वार क्यूँ.....अलका गुप्ता
जंगल की कंदराओं से निकल तुम |
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम |
क्यूँ हो अभी भी दानव.... इतने तुम !
अत्याचार ये..इतने वीभत्स वार क्यूँ ?
मानवता आज भी इतनी निढाल क्यूँ ?
बलात्कार हिंसा यह.....लूटमार क्यूँ ?
साथ थी विकास में संस्कृति के वह |
उसका ही इतना.......तिरस्कार क्यूँ ?
प्रकट ना हुआ था प्रेम-तत्व.....तब |
स्व-स्वार्थ निहित था आदिमानव तब |
एक माँ ने ही सिखाया होगा प्रेम...तब |
उमड़ पड़ा होगा छातियों से दूध...जब |
संभाल कर चिपकाया होगा तुझे तब |
माँस पिंड ही था एक....तू इंसान तब |
ना जानती थी फर्क...नर-मादा का तब |
आज मानव जान कर भी अनजान क्यूँ ?
जंगल की कंदराओं से निकल...तुम |
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम||
-अलका गुप्ता
Sunday, May 14, 2017
जानती हूँ ...मेरी माँ....अलका गुप्ता
.......मातृ-दिवस पर विशेष......
कुछ दिल में अरमान हैं ।
मैं भी कुछ करूँ ...।
यूँ ही न मरुँ ...।
दुनियां अपनी करूँ ।।
चंद सांसें मुझे भी ,
जी लेने दे ...मेरी माँ !
जानती हूँ ...मेरी माँ !
तुम्हारे दिल का दर्द ।
जो तुमने झेला है ।।
उससे ही बचाना है ।
मगर कुछ सोचो... माँ !
हिम्मत कर माँ !!
अजन्मी इस बेटी को ...
तुझे आज बचाना है ..!!!
क्यूंकि दिल में .....
उसके भी .....
कुछ अरमान हैं ।।
-अलका गुप्ता
Wednesday, March 22, 2017
क्यूँ हो अभी भी दानव.... इतने तुम...अलका गुप्ता
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम |
क्यूँ हो अभी भी दानव.... इतने तुम !
अत्याचार ये..इतने वीभत्स वार क्यूँ ?
मानवता आज भी इतनी निढाल क्यूँ ?
बलात्कार हिंसा यह.....लूटमार क्यूँ ?
साथ थी विकास में संस्कृति के वह |
उसका ही इतना.......तिरस्कार क्यूँ ?
प्रकट ना हुआ था प्रेम-तत्व.....तब |
स्व-स्वार्थ निहित था आदिमानव तब |
एक माँ ने ही सिखाया होगा प्रेम...तब |
उमड़ पड़ा होगा छातियों से दूध...जब |
संभाल कर चिपकाया होगा तुझे तब |
माँस पिंड ही था एक....तू इंसान तब |
ना जानती थी फर्क...नर-मादा का तब |
आज मानव जान कर भी अनजान क्यूँ ?
जंगल की कंदराओं से निकल...तुम |
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम||
क्यूँ हो अभी भी दानव.... इतने तुम !
अत्याचार ये..इतने वीभत्स वार क्यूँ ?
-अलका गुप्ता
Monday, March 13, 2017
कोरे पन्ने......अलका गुप्ता
अन्तः करण कि आवाज थी ...कहाँ ?
कभी ...आत्मा कि अनसुलझी पुकार ||
नित नए... अवसाद समेटे हुए ....
या कभी....विवादित से हुए वो छार ||
डायरी में रहे क्यूँ शेष ये कोरे पन्ने |
सिकुड़े से कुछ गुंजले पीले से कोर ||
थी... क्या व्यथा ...ऐसी ...जो ..
उभर ना सके थे शब्दों के अभिसार ||
मिल न सके ...क्यूँ ....स्मृतियों के ...
बेचैन से लिखित ...........कोई छोर ||
आज जो रुक गए आकर ..आवक ...
कोरे पन्नो पे पलटते अँगुलियों के पोर ||
उकसा रहा मन विकल कोरे इन पन्नों से |
कोरे रह जाने के अनसुलझे से तार ||
आंदोलित करते रहे पुरानी डायरी के ...
अनलिखे...... ये .....शब्द सार ||
या आवाक है हटात ...व्यर्थ रहा ..
जीवन यूँ ही रहा ....कोरा सा ... सार ||
-अलका गुप्ता
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