
माँ..
सारे दिन खटपट करतीं
लस्त- पस्त हो
जब झुँझला जातीं
तब...
तुम कहतीं-एक दिन
ऐसे ही मर जाउँगी
कभी कहतीं -
देखना मर कर भी
एक बार तो उठ जाउँगी
कि चलो-
समेटते चलें
हम इस कान सुनते
तुम्हारा झींकना
और उस कान निकाल देते
क्योंकि-
हम अच्छी तरह जानते थे
माँ भी कभी मरती हैं !
कितने सच थे हम
आज..
जब अपनी बेटी के पीछे
किटकिट करती
घर- गृहस्थी झींकती हूँ
तो कहीं-
मन के किसी कोने में छिपी
आँचल में मुँह दबा
तुम धीमे-धीमे
हंसती हो माँ...!!!
-उषा किरण
"ताना- बाना” से