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Tuesday, April 7, 2020

दायरे से वो निकलता क्यों नहीं ...ममता किरण

दायरे से वो निकलता क्यों नहीं
ज़िंदगी के साथ चलता क्यों नहीं

बोझ सी लगने लगी है ज़िंदगी
ख़्वाब एक आँखों में पलता क्यों नहीं

कब तलक भागा फिरेगा ख़ुद से वो
साथ आख़िर अपने मिलता क्यों नहीं

गर बने रहना है सत्ता में अभी
गिरगिटों सा रंग बदलता क्यों नहीं

बातें ही करता मिसालों की बहुत
उन मिसालों में वो ढलता क्यों नहीं

ऐ ख़ुदा दुख हो गये जैसे पहाड़
तेरा दिल अब भी पिघलता क्यों नहीं

ओढ़ कर बैठा है क्यूँ खामोशियाँ
बन के लौ फिर से वो जलता क्यों नहीं

क्या हुई है कोई अनहोनी कहीं
दीप मेरे घर का जलता क्यों नहीं.
-ममता किरण

Saturday, June 30, 2018

अपने बचपन का सफ़र याद आया...ममता किरण

अपने बचपन का सफ़र याद आया
मुझको परियों का नगर याद आया

जो नहीं था कभी मेरा अपना
क्यूँ मुझे आज वो घर याद आया

कोई पत्ता न हिले जिसके बिना
रब वही शामो ए सहर याद आया

इतना शातिर वो हुआ है कैसे
है सियासत का असर याद आया

रोज़ क्यूँ सुर्ख़ियों में रहता है
है यही उसका हुनर याद आया

जब कोई आस ही बाकी न बची
मुझको बस तेरा ही दर याद आया

उम्र के इस पड़ाव पे आकर
क्यूँ जुदा होने का डर याद आया

माँ ने रखा था हाथ जाते हुए
फिर वही दीदे ए तर याद आया

जिसकी छाया तले किरण थे सब
घर के आँगन का शजर याद आया।
-ममता किरण

Sunday, January 28, 2018

बाग जैसे गूँजता है पंछियों से......ममता किरण

बाग जैसे गूँजता है पंछियों से
घर मेरा वैसे चहकता बेटियों से

घर में आया चाँद उसका जानकर वो
छुप के देखे चूड़ियों की कनखियों से

क्या मेरी मंज़िल मुझे ये क्या ख़बर
कह रहा था फूल इक दिन पत्तियों से

दिल का टुकड़ा है डटा सीमाओं पर
सूना घर चहके है उसकी चिट्ठियों से

बंद घर देखा जो उसने खोलकर
एक क़तरा धूप आयी खिड़कियों से

एक शजर ख़ुद्दार टकराने को था
थी चुनौती सामने जब आँधियों से

ख़्वाब में देखा पिता को य़ूँ लगा
हो सदाएँ मंदिरों की घंटियों से

फोन वो खुशबू कहाँ से लाएगा
वो जो आती थी तुम्हारी चिट्ठियों से
-ममता किरण