सखि बसंत आ गया
सबके मन भा गया
धरती पर छा गया
सुषमा बिखरा गया
आमों में बौर लदे
कुहू-कुहू भली लगे
बागों में फूल खिले
भौंरे हैं झूम चले
मंद-मंद पवन चली
मन की है कली खिली
शिशिर शीत भाग गया
सुखद बसंत आ गया
खुशियां बरसा गया
सखि बसंत आ गया।
- शकुन्तला बहादुर
लेखिका एन. आर. आई. हैं