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Sunday, July 7, 2019

"फिक्र".....मीना भारद्वाज

मेरी कुछ यादें और उम्र के अल्हड़ बरस ।
अब भी रचे-बसे होंगें उस छोटे से गाँव में ।।

जिसने ओढ़ रखी है बांस के झुरमुटों की चादर ।
और सिमटा हुआ है ब्रह्मपुत्र की बाहों में ।।

आमों की बौर से लदे सघन कुंजों से ।
      पौ फटते ही कोयल की कुहूक गूँजा करती थी ।।

गर्मी की लूँ सी हवाएँ बांस के झुण्डों से ।
सीटी सी सरगोशी लिए बहा करती थी ।।

हरीतिमा से ढका एक छोटा सा घर ।
मोगरे , चमेली और गुलाबों सा महकता था ।।

अमरूद , आम और घने पेड़ों  के बीच ।
हर दम सोया सोया सा रहता था ।।

बारिशों के मौसम में उसकी फिक्र सी रहने लगी है ।
नाराजगी में नदियाँ गुस्से का इजहार करने लगी हैं ।।


लेखक परिचय - मीना भारद्वाज