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Sunday, June 17, 2018

" भारत भाग्य... "....कमलकिशोर पाण्डेय



बोला था -
घर घर जाओ,
जाकर हाल पूछते आओ .

दो दिन में, दस गाँवों का
तुम  सर्वे करके लाए हो ,
सच सच बोलो, क्या फिर से
सिर्फ़ सरपंच से मिलके आए हो?

कितने भूखे हैं,
कितने लाचार .
वो शख्स समझ कहाँ पाया है ?
जो जातिवाद के चश्मे से इंसान नापता आया है.

बोला था-
हर चूल्‍हे के हर हाल को.
बेरोज़गारी के हर जाल को,
क़ैद कर लो, इन फार्मों में.

इनसे ,भारत निर्माण की 
तस्वीरें  बनेगी ,
देश बनेगा ,
तक़दीरें बनेंगी 

सच बोलो ! ये आँकड़े -
क्या खुद से भरकर आए हो?
सच सच बोलो ,क्या फिर से-
सिर्फ़ सरपंच से मिलकर आए हो?
-कमलकिशोर पाण्डेय
मूल रचना

Sunday, April 15, 2018

टॉफी...कमलकिशोर पाण्डेय


पीली टॉफी,
नीली टॉफी
चमकीली साड़ी में लिपटी टॉफी.

चपटी टॉफी, गोल टॉफी,
ढोलक की शक्ल वाली डाँवाडोल टॉफी.

छोटी लड़की ने सारी टॉफी देख डालीं-
परचून की दुकान के मर्तबान में.

तब दुकानदार को पर्ची बढ़ाई.
49 के सामान पर, दुकानदार ने-
एक रुपये की टॉफी देनी चाही.

मर्तबान में ज्यों ही हाथ डाला,
लड़की की आँखों के आगे-
फिर नाचने लगीं
पीली टॉफी,
नीली टॉफी
चमकीली साड़ी में लिपटी टॉफी.

कुछ टॉफियाँ 
खींचकर बाहर निकालीं
तब समझदार छोटी लड़की बोली-
टॉफी नहीं,
इनके बदले
माचिस की  डिब्बी  दे  दो . 
-कमलकिशोर पाण्डेय
मूल रचना