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Monday, December 28, 2020

प्रभात-सौंदर्य ....कौशल शुक्ला

प्रसन्न चित्त भावना, विषाद को निगल गयी।
नयी नयी उमंग देख, आत्मा उछल गई।।

निरख सुबह कि लालिमा, निशा प्रछन्न हो गयी
गगन की ओर देखकर, धरा प्रसन्न हो गयी
प्रभात में तरंग का, प्रवाह तेज हो गया
उषा ने आँख खोल दी, भ्रमर कली में खो गया

चमन में फूल खिल गया, बहार फिर मचल गयी।
नयी नयी उमंग देख, आत्मा उछल गई।।

किरण चली दुलारने, नए नए विहान को
खगों की झुंड उड़ चली, विशाल आसमान को
पुकारने लगा विहान, बाग दे रहा समय
उठो तुम्हे है जागना, कि सूर्य हो गया उदय

सुगंध संग ले पवन, कली को छू निकल गयी।
नयी नयी उमंग देख, आत्मा उछल गई।।

- कौशल शुक्ला

मूल रचना

Wednesday, November 11, 2020

अपनी औकात की मत नुमाईश करो ...कौशल शुक्ला


देख गिरी दीवार, धमाका मेरा है
इस प्रदेश का सीएम, काका मेरा है
जुबां हिलाने से पहले यह तय कर ले
मेरी है सरकार, इलाका मेरा है

प्यार नहीं फिर भी यह दावा काहे का ?
लुटने को तैयार, छलावा काहे का ?
मुझको पानी-पानी करके खुश हो ले
दिल मे रखते हो यह लावा काहे का ?

आज जुदा हूँ तो पछतावा काहे का ?
देते हो हर रोज बुलावा काहे का ?
घर में भुजी भांग नहीं तेरे 'कौशल'
भोज जायकेदार, दिखावा काहे का ?

बस यूँही रास्ता नापते-नापते
आ गया मैं इधर ही, जहाँ आप थे
'अपनी औकात की मत नुमाईश करो'
मेरे दिल ने कहा हाँफते-हाँफते
- कौशल शुक्ला


Saturday, October 10, 2020

तुम सीमा के पार न जाना .....कौशल शुक्ला


जहाँ नहीं अधिकार न जाना।
तुम सीमा के पार न जाना।।

दीपक एक पतंगे लाखों
स्वप्न लिए परिणय की आँखों
कुछ भी हाथ नहीं आता है
मृग-तृष्णा संसार न जाना?
तुम सीमा के पार न जाना।।

सबके मन मे चंचलता है
जिसको जितना भी मिलता है
इच्छाएँ बढ़ती जाती हैं
जीवन का व्यवहार न जाना?
तुम सीमा के पार न जाना।।

सुख में साथ निभाती है यह
दुःख में ऑंख दिखाती है यह
संकट के घिरते ही दुनियाँ
करती तीखे वार न जाना?
तुम सीमा के पार न जाना।।

-कौशल शुक्ला 

Saturday, September 19, 2020

झट से कह दो प्यार नहीं है ...कौशल शुक्ला

 

यदि तुमको स्वीकार नहीं है।

झट से कह दो प्यार नहीं है।।


बातों में मत यूँ उलझाओ

प्रेम करो अथवा ठुकराओ

तुम तो मोल-भाव करती हो

प्रेम कोई व्यापार नहीं है।

झट से कह दो प्यार नहीं है।।


मुँह से आह कढ़ी जाती है

हद से बात बढ़ी जाती है

क्योंकर मुझको झेल रही हो

जब दिल ही तैयार नहीं है।

झट से कह दो प्यार नहीं है।।


सुख की गंध तुम्हें प्यारी है

दुःख का बोझ बहुत भारी है

हर कठिनाई डटकर झेलें

जीवन का आधार यही है।

झट से कह दो प्यार नहीं है।।


तुम्हें पता है मैं कैसा हूँ

मैं पहले से ही ऐसा हूँ

सच्चाई स्वीकार करो यह

सपनों का संसार नहीं है।

झट से कह दो प्यार नहीं है।।


मैं तेरी बातों में आकर

माँ को छोड़ तुम्हें अपनाकर

तेरे आगे पूँछ हिलाऊँ

यह मेरा व्यवहार नहीं है।

झट से कह दो प्यार नहीं है।।


तुमको समझा कर मैं हारा

उड़न-खटोला तुमको प्यारा

जिसपर तुमको रोज घुमाउँ

मेरे घर वह कार नहीं है।

झट से कह दो प्यार नहीं है।।


एक बात तुमको बतला दूँ

कह दो तो मैं गाँठ लगा दूँ

तेरे कारण दुनियाँ छोड़ूँ

मुझको यह अधिकार नहीं है।

झट से कह दो प्यार नहीं है।।


झूठ-मूठ मत प्यार जताओ

नई राह कोई अपनाओ

मैं अपने रस्ते जाता हूँ

तुम पर कोई भार नहीं है।

झट से कह दो प्यार नहीं है।।


समय नहीं बर्बाद करो तुम

खुद को अब आज़ाद करो तुम

ढूंढो कोई मीत निराला

मुझको कुछ प्रतिकार नहीं है

झट से कह दो प्यार नहीं है।।

-कौशल शुक्ला

मूल रचना



Saturday, September 5, 2020

रेत पर पदचिन्ह ..कौशल शुक्ला

'दो घड़ी भी टिक सकेगा' क्या कभी तुमने विचारा?
रेत पर पदचिन्ह तेरे और सागर का किनारा।।

जिंदगी के रास्तों पर सैकडों दुश्वारियां हैं
मुश्किलों से जूझने की क्या तेरी तैयारियाँ हैं
पथ जरा समतल मिला तुम भूल बैठे कंटकों को
लक्ष्य को पाने से पहले लाख जिम्मेदारियां हैं

धैर्य खोकर चाहते हो भाग्य का चमके सितारा।
रेत पर पदचिह्न तेरे और सागर का किनारा।।

दैव ने तुमको दिए दो हाथ इनको खोल देखो
पाँव को मजबूत कर लो, अड़चनों का मोल देखो
जान लो क्या खूबियाँ भगवान ने तुझमें भरी हैं
आँख मंजिल पर टिकाकर, जिंदगी को तोल देखो

तूँ अकेला ही बढ़ा चल ढूँढ मत कोई सहारा।
रेत पर पदचिन्ह तेरे और सागर का किनारा।।

पर्वतों को काट करके रास्ता अपना बना लो
ठोकरों से राह के सब पत्थरों को तुम उछालो

छोड़ दो पदचिन्ह पीछे जो मिटाए भी मिटे ना
जिंदगी है जंग, हँसकर हमसफ़र इसको बना लो

'आँख से पर्दा हटा लो' वक्त ने तुमको पुकारा।
रेत पर पदचिन्ह तेरे और सागर का किनारा।।
-कौशल शुक्ला

Monday, September 9, 2019

कौशल शुक्ला


मैंने पत्थर में भी फूलों सी नज़ाकत देखी
पिस के सीमेंट बने, ऐसी शराफ़त देखी

थी तेज हवा, उनका आँचल गिरा गई
इस शहर ने उस रोज क़यामत देखी

'मर्ज कैसा भी हो, दो दिन में चला जायेगा'
तुमनें दीवार पर लिखी वो इबारत देखी?

क्या बेमिसाल जश्न मनाया था गए साल
उस विधायक की बड़ी जीत की दावत देखी?

अब एम ए भी भरा करते हैं चपरासियों के फार्म
हमारे देश में रोजगार की किल्लत देखी?

कितने शरीफ़ लगते थे अल्फ़ाज़ जिगर में,
अब कागज़ों पर इनकी शरारत देखी?

-कौशल शुक्ला

Saturday, April 14, 2018

इनकी शरारत तो देखिए....कौशल शुक्ला

है मुफ़लिसी का दौर पर हिम्मत तो देखिए,
इस शायर-ए-फनकार की मोहब्बत तो देखिए।

बिन पंख के ही उड़ने को बेताब किस कदर,
नादान परिंदे की हसरत तो देखिए।

सूखे में किसानों का जीना मोहाल था,
अब बाढ़ है, खुदाई रहमत तो देखिए।

जब से हमारे शहर अदाकार आ गए,
बाज़ार में अश्कों की कीमत तो देखिए।

सदियों से परिंदों के जो आशियाँ रहे,
इन शख्त दरख्तों की नज़ाकत तो देखिए।

हर कायदे-कानून के वे जानकार हैं,
यह कवायद, पैंतरे, हुज्जत तो देखिए।

कहीं गाली, कहीं गंठजोड़ की जद्दो-जहद शुरू,
इस सियासी ऊंट की करवट तो देखिए।

जिसको भी देखिए वही कींचड़ में सना है,
सियासत में शरीफों की किल्लत तो देखिए।

जीने की आरज़ू में मरे जा रहें हैं लोग,
यह ख्वाहिश-ए-दौलत, ये जरूरत तो देखिए।

‘बाप’ छोड़िए, इन्हें ‘दादा’ बना लिया,
इस शहर में गुंडों की इज्जत तो देखिए।

जेल से रिहा नेता का खैरात लूटते,
चिथड़े लपेटे बच्चे की किस्मत तो देखिए।

अल्फ़ाज की तपिश को सीने में दबाकर,
गुम-सुम पड़े पन्ने की शराफत तो देखिए।

पिंजरे में कुलबुलाते दिल के सभी अरमान,
अब कागजों पर इनकी शरारत तो देखिए।

-कौशल शुक्ला