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Wednesday, October 2, 2019

बदलते रंगों में ...दीप्ति शर्मा

तुम्हारे चाहने से रंग नहीं बदलते
प्रेम नहीं बदलते

खून लाल ही रहता है
और आसमान नीला

जैसे प्रेम बढ़ता है
खून अधिक लाल हो जाता
आसमान अधिक नीला

बढ़ते रंगों में
हम-तुम एक से हो गये
देखो !
प्रेम हमारा इंद्रधनुष बन रहा
बरस रहा
अब धरती सुनहरी हो चली है ।

@दीप्ति शर्मा

Saturday, December 15, 2018

मैं हूँ पर तुम-सी....दीप्ति शर्मा

पिता
मेरी धमनियों में दौड़ता रक्त
और तुम्हारी रिक्तता
महसूस करती मैं,
चेहरे की रंगत का तुमसा होना
सुकून भर देता है मुझमें
मैं हूँ पर तुम-सी
दिखती तो हूँ खैर
हर खूबी तुम्हारी पा नहीं सकी
पिता
सहनशीलता तुम्हारी,
गलतियों के बावजूद मॉफ करने की
साथ चलने की
सब जानते चुप रहने की 
मुझे नहीं मिली 
मैं मुँहफट हूँ कुछ,  तुमसी नहीं
पर होना चाहती हूँ
सहनशील 
तुम्हारे कर्तव्यों सी निष्ठ बन जाऊँ एक रोज
पिता
महसूस करती हूँ 
मुरझाए चेहरे के पीछे का दर्द
तेज चिडचिडाती रौशनी में काम करते हाथ
कौन कहता है पिता मेहनती नहीं होते
उनकी भी बिवाइयों में दरार नहीं होती है
चेहरे पर झुर्रियां 
कलेजे में अनगिनत दर्द समेटे
आँखों में आँसू छिपा
प्यार का अथाह सागर
होता है पिता
तुम 
सागर हो
आकाश हो
रक्त हो
बीज हो 
मुझमें हो 
बस और क्या चाहिए
पिता
जो मैं हूबहू तुमसी हो जाऊँ ।
-दीप्ति शर्मा

Thursday, November 29, 2018

आवाज़.....दीप्ति शर्मा


आवाज़ जो
धरती से आकाश तक
सुनी नहीं जाती
वो अंतहीन मौन आवाज़
हवा के साथ पत्तियों
की सरसराहट में
बस महसूस होती है
पर्वतों को लाँघकर
सीमाएँ पार कर जाती हैं
उस पर चर्चायें की जाती हैं
पर रात के सन्नाटे में
वो आवाज़ सुनी नहीं जाती
दबा दी जाती है
सुबह होने पर
घायल परिंदे की
अंतिम साँस की तरह
अंततः दफ़न हो जाती है
वो अंतहीन मौन आवाज़

-दीप्ति शर्मा

Thursday, October 27, 2016

आवाज़.............दीप्ति शर्मा













आवाज़ जो
धरती से आकाश तक
सुनी नहीं जाती
वो अंतहीन मौन आवाज़
हवा के साथ पत्तियों
की सरसराहट में
बस महसूस होती है
पर्वतों को लाँघकर
सीमाएँ पार कर जाती हैं
उस पर चर्चायें की जाती हैं
पर रात के सन्नाटे में
वो आवाज़ सुनी नहीं जाती
दबा दी जाती है
सुबह होने पर
घायल परिंदे की
अंतिम साँस की तरह
अंततः दफ़न हो जाती है
वो अंतहीन मौन आवाज़
-दीप्ति शर्मा