स्व के अर्थ

नितान्त अकेली हूं,
पर उदास नहीं
कामों की लंबी सूची को
तह कर के
डाल दिया है
अलमारी के
सबसे ऊपरी खाने में
और चुरा लिया है
कुछ घंटों का समय
केवल अपने लिए
बैठूंगी यूं ही
पैर पे पैर चढ़ाए
गर्म चाय का मग लिए
हाथों में
ताकूंगी यूं ही
खिड़की के बाहर
देखूंगी दोपहर के
बदलते रंग
जानती हूं
नियमों में चल रही दुनिया
तो रोकेगी मुझे
कहेगी स्वार्थी हूं मैं
पर दुनिया तो
हर बात का लेबल लिए
तैयार खड़ी रहती है
उसकी हर बात पे
कान नहीं देना मुझे
उंहू... आज तो बिल्कुल नहीं
क्योंकि कभी कभी
जीवन का थोड़ा सा हिस्सा
स्व के लिए जीना
भी तो नितान्त ज़रूरी है
ये स्वार्थ
हू ब हू
परिचित करा जाता है
मुझे अपने
स्व के अर्थों से
और...
फिर जाग उठती है
इच्छा ज़िन्दगी के साथ
क़दमताल करने की

- शिल्पा शर्मा
मूल रचना