आज भुनने लगी अधर है ,
रेगिस्तानी प्यास।
रोम रोम में लगता जैसे ,
सुलगे कई अलाव ।
मन को , टूक टूक करते,
ठंडक के सुखद छलाव ।
पंख कटा धीरज का पंछी ,
लगता बहुत उदास।
महासमर का दृश्य ला रही है,
शैतान लपट ।
धूप, चील जैसी छाया पर ,
प्रति पल रही झपट ।
कर वसंत को याद बगीचा,
...देखे महाविनाश।
सबको आत्मसमर्पित पा कर ,
सूरज शेर हुआ ।
आतप , भीतर छिपे सभी ,
कैसा अंधेर हुआ ।
परिवर्तन की आशा जब तक,
होना नहीं निराश।
बाढ़ थमेगी तभी ग्रीष्म की ,
पावस जब आये ।
लू -लपटों की भारी गर्मी ,
तब मुँह की खाए ।
अनुपम धैर्य प्रकृति का लख ,
मौसम कहता शाबाश ।
सर्वाधिकार - गीतकार जानकीप्रसाद 'विवश '