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Thursday, June 8, 2017

चांद बेवफा नहीं होता.....स्मृति आदित्य









चांद नहीं कहता 
तब भी मैं याद करती तुम्हें 
चांद नहीं सोता 
तब भी मैं जागती तुम्हारे लिए 
चांद नहीं बरसाता अमृत 
तब भी मुझे तो पीना था विष 
चांद नहीं रोकता मुझे 
सपनों की आकाशगंगा में विचरने से 
फिर भी मैं फिरती पागलों की तरह 
तुम्हारे ख्वाबों की रूपहली राह पर।   

चांद ने कभी नहीं कहा 
मुझे कुछ करने से 
मगर फिर भी 
रहा हमेशा साथ 
मेरे पास
बनकर विश्वास। 
यह जानते हुए भी कि 
मैं उसके सहारे   
और उसके साथ भी
उसके पास भी 
और उसमें खोकर भी 
याद करती हूं तुम्हें। 
मैं और चांद दोनों जानते हैं कि 
चांद बेवफा नहीं होता। 
-स्मृति आदित्य

Sunday, November 8, 2015

केसर-चंदन सा महकाने के लिए.... फाल्गुनी









रोज ही 
एक नन्ही सी 
नाजुक-नर्म कविता 
सिमटती-सिकुड़ती है 
मेरी अंजुरि में..
खिल उठना चाहती है 
किसी कली की तरह...
शर्मा उठती है 
आसपास मंडराते 
अर्थों और भावों से..
शब्दों की आकर्षक अंगुलियां 
आमंत्रण देती है 
बाहर आ जाने का. ..
नहीं आ पाती है 
मुरझा जाती है फिर 
उस पसीने में, 
जो बंद मुट्ठी में 
तब निकलता है 
जब जरा भी फुरसत नहीं होती 
कविता को खुली बयार में लाने की...
कविता.... 
लौट जाती है 
अगले दिन 
फिर आने के लिए... 
बस एक क्षण 
केसर-चंदन सा महकाने के लिए....
-स्मृति आदित्य 



Tuesday, September 29, 2015

कोई रंगीन सी उगती हुई कविता.... फाल्गुनी

रख दो 
इन कांपती हथेलियों पर 
कुछ गुलाबी अक्षर 
कुछ भीगी हुई नीली मात्राएं 
बादामी होता जीवन का व्याकरण, 

चाहती हूं कि 
उग ही आए कोई कविता
अंकुरित हो जाए कोई भाव, 
प्रस्फुटित हो जाए कोई विचार 
फूटने लगे ललछौंही कोंपलें ...
मेरी हथेली की ऊर्वरा शक्ति

सिर्फ जानते हो तुम 
और तुम ही दे सकते हो 
कोई रंगीन सी उगती हुई कविता 
इस 'रंगहीन' वक्त में.... 

-स्मृति