सुबह खोल रही है,
अपना लिफ़ाफ़ा हौले से।
गली से निकल रहे हैं लोग,
वही कल के काम पर।
उड़ते हुए परिंदों की चोंचों में,
वही तिनके हैं कल से।
फूलों ने पंखुड़ी बिछाई है आसमां तलक़
रोज़ की तरह।
मुट्ठी में जितने हो सकें
समेट लो लम्हें आज,
कि ज़िन्दगी शांत खड़ी है देहलीज़ पे
अपनी बाहें फैलाये,
बस तुम्हारे लिए।
-सुचेतना मुखोपाध्याय
