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Monday, April 27, 2020

मैं क्या करूू ...डॉ. अख़्तर खत्री

सिर्फ़ तुम हो, ख़याल या ख़्वाब, क्या करूँ ?
तुम अब याद आ रहे हो बेहिसाब, क्या करूँ ?

कोई बसता ही नहीं, तुमसे बिछड़ने के बाद,
ज़हन ये मेरा तुम्ही से है आबाद, क्या करूँ ?

इंतेज़ार का मौसम बिता ही नहीं कभी भी,
रोज़ लग रहा कि आओगे आज, क्या करूँ ?

ख़लिश हर जगह, कमियां हर लम्हे में है,
सूनी ये ग़ज़लें, सूने है अल्फाज़, क्या करूँ ?

अब तो सुन लो तुम इल्तेजा 'अख़्तर' की,
रूह अब ये होने को है आज़ाद, क्या करूँ ?
-डॉ. अख़्तर खत्री

Monday, March 30, 2020

अच्छा हुआ ....डॉ. अख़्तर खत्री

आख़िर में हम मिल गए, अच्छा हुआ,
बाकी सब हम भूल गए, अच्छा हुआ ।

मैं मुझ में नहीं हूं, तुम ख़ुद में नहीं हो,
दूजे की रूह में घुल गए, अच्छा हुआ ।

मुराज़ई हुई सी थी ज़िंदगियां अपनी,
दिल से दिल तक खिल गए, अच्छा हुआ ।

ख़ुदा ने लिखा था और हो गया, देखो,
नसीब अपने खुल गए, अच्छा हुआ ।

आ गए तुम 'अख़्तर' की इन बाहों में,
लौट कर के ना फ़िर गए, अच्छा हुआ ।
-डॉ. अख़्तर खत्री