Showing posts with label सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय". Show all posts
Showing posts with label सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय". Show all posts
Saturday, July 18, 2020
Friday, April 5, 2019
चितवन .....सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"
क्या दिया था तुम्हारी एक चितवन ने उस एक रात
जो फिर इतनी रातों ने मुझे सही-सही समझाया नहीं?
क्या कह गयी थी बहकी अलक की ओट,
तुम्हारी मुस्कान एक बात
जिस का अर्थ फिर किसी प्रात की
किसी भी खुली हँसी ने बताया नहीं?
इधर मैं निःस्व हुआ, पर अभी चुभन यह सालती है
कि मैं ने तुम्हें कुछ दिया नहीं,
बार-बार हम मिले, हँसे, हम ने बातें कीं,
फिर भी यह सच है कि हम ने कुछ किया नहीं।
उधर तुम से अजस्र जो मिला, सब बटोरता रहा,
पर इसी लुब्ध भाव से कि मैं ने कुछ पाया नहीं!
दुहरा दो, दुहरा दो, तुम्हीं बता दो
उस चितवन ने क्या कहा था
जिस में तुम ही तुम थे, संसार भी डूब गया था
और मैं भी नहीं रहा था...
-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"
Thursday, December 13, 2018
शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!.....सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"
वंचना है चाँदनी सित,
झूठ वह आकाश का निरवधि, गहन विस्तार-
शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!
दूर वह सब शान्ति, वह सित भव्यता,
वह शून्यता के अवलेप का प्रस्तार-
इधर-केवल झलमलाते चेतहर,
दुर्धर कुहासे का हलाहल-स्निग्ध मुट्ठी में
सिहरते-से, पंगु, टुंडे, नग्न, बुच्चे, दईमारे पेड़!
पास फिर, दो भग्न गुम्बद, निविडता को भेदती चीत्कार-सी मीनार,
बाँस की टूटी हुई टट्टी, लटकती
एक खम्भे से फटी-सी ओढऩी की चिन्दियाँ दो-चार!
निकटतर-धँसती हुई छत, आड़ में निर्वेद,
मूत्र-सिंचित मृत्तिका के वृत्त में
तीन टाँगों पर खड़ा, नतग्रीव, धैर्य-धन गदहा।
निकटतम-रीढ़ बंकिम किये, निश्चल किन्तु लोलुप खड़ा
वन्य बिलार- पीछे, गोयठों के गन्धमय अम्बार!
गा गया सब राजकवि, फिर राजपथ पर खो गया।
गा गया चारण, शरण फिर शूर की आ कर, निरापद सो गया।
गा गया फिर भक्त ढुलमुल चाटुता से वासना को झलमला कर,
गा गया अन्तिम प्रहर में वेदना-प्रिय, अलस, तन्द्रिल,
कल्पना का लाड़ला कवि, निपट भावावेश से निर्वेद!
किन्तु अब-नि:स्तब्ध-संस्कृत लोचनों का
भाव-संकुल, व्यंजना का भीरु, फटा-सा, अश्लील-सा विस्फार।
झूठ वह आकाश का निरवधि गहन विस्तार-
वंचना है चाँदनी सित,
शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!
-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"
Thursday, November 1, 2018
ऊपर फैला है आकाश....अज्ञेय
ऊपर फैला है आकाश, भरा तारों से- अज्ञेय
ऊपर फैला है आकाश,भरा तारों से
भार-मुक्त से तिर जाते हैं
पंछी डैने बिना फैलाये ।
जी होता है मैं सहसा गा उठूँ
उमगते स्वर
जो कभी नहीं भीतर से फूटे
कभी नहीं जो मैं ने -
कहीं किसी ने - गाये ।
किन्तु अधूरा है आकाश
हवा के स्वर बन्दी हैं
मैं धरती से बँधा हुआ हूँ -
हूँ ही नहीं, प्रतिध्वनि भर हूँ
जब तक नहीं उमगते तुम स्वर में मेरे प्राण-स्वर
तारों मे स्थिर मेरे तारे,
जब तक नही तुम्हारी लम्बायित परछाहीं
कर जाती आकाश अधूरा पूरा ।
भार-मुक्त
ओ मेरी संज्ञा में तिर जाने वाले पंछी
देख रहा हूँ तुम्हें मुग्ध मैं ।
यह लो :
लाली से में उभर चम्पई
उठा दूज का चाँद कँटीला ।
-अज्ञेय
Tuesday, September 18, 2018
असीम प्रणय की तृष्णा...अज्ञेय

(1)
आशाहीना रजनी के अन्तस् की चाहें,
हिमकर-विरह-जनित वे भीषण आहें
जल-जल कर जब बुझ जाती हैं,
जब दिनकर की ज्योत्स्ना से सहसा आलोकित
अभिसारिका ऊषा के मुख पर पुलकित
व्रीडा की लाली आती है,
भर देती हैं मेरा अन्तर जाने क्या-क्या इच्छाएँ-
क्या अस्फुट, अव्यक्त, अनादि, असीम प्रणय की तृष्णाएँ!
भूल मुझे जाती हैं अपने जीवन की सब कृतियाँ :
कविता, कला, विभा, प्रतिभा-रह जातीं फीकी स्मृतियाँ।
अब तक जो कुछ कर पाया हूँ, तृणवत् उड़ जाता है,
लघुता की संज्ञा का सागर उमड़-उमड़ आता है।
तुम, केवल तुम-दिव्य दीप्ति-से, भर जाते हो शिरा-शिरा में,
तुम ही तन में, तुम ही मन में, व्याप्त हुए ज्यों दामिनी घन में,
तुम, ज्यों धमनी में जीवन-रस, तुम, ज्यों किरणों में आलोक!
(2)
क्या दूँ, देव! तुम्हारी इस विपुला विभुता को मैं उपहार?
मैं-जो क्षुद्रों में भी क्षुद्र, तुम्हें-जो प्रभुता के आगार!
अपनी कविता? भव की छोटी रचनाएँ जिस का आधार?
कैसे उस की गरिमा में भर दूँ गहराता पारावार?
अपने निर्मित चित्र? वही जो असफलता के शव पर स्तूप?
तेरे कल्पित छाया-अभिनय की छाया के भी प्रतिरूप!
अपनी जर्जर वीणा के उलझे-से तारों का संगीत?
जिसमें प्रतिदिन क्षण-भंगुर लय बुद्बुद होते रहें प्रमीत!
(3)
विश्वदेव! यदि एक बार,
पा कर तेरी दया अपार, हो उन्मत्त, भुला संसार-
मैं ही विकलित, कम्पित हो कर-नश्वरता की संज्ञा खो कर,
हँस कर, गा कर, चुप हो, रो कर-
क्षण-भर झंकृत हो-विलीन हो-होता तुम से एकाकार!
बस एक बार!
1911-1987
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"
Subscribe to:
Posts (Atom)






