मैं एक मजदूर हूं
भगवान की आंखों से मैं दूर हूं
छत खुला आकाश है
हो रहा वज्रपात है
फिर भी नित दिन मैं
गाता राम धुन हूं
गुरु हथौड़ा हाथ में
कर रहा प्रहार है
सामने पड़ा हुआ
बच्चा कराह रहा है
फिर भी अपने में मगन
कर्म में तल्लीन हूं
मैं एक मजदूर हूं
भगवान की आंखों से मैं दूर हूं।
आत्मसंतोष को मैंने
जीवन का लक्ष्य बनाया
चिथड़े-फटे कपड़ों में
सूट पहनने का सुख पाया
मानवता जीवन को
सुख-दुख का संगीत है
मैं एक मजदूर हूं
भगवान की आंखों से मैं दूर हूं।
--राकेशधर द्विवेदी
कवि नजरबंद है और लेखनी निराश है
भारत धरा की जनता अब तो उदास है
साहित्य जगत से अब न कोई रह गई आशा
क्योंकि वहां पसरा हुआ है सन्नाटा
सूर्य हुआ अस्त है, लुटेरा हुआ मस्त है
साहित्यकार आज यश भारती में व्यस्त है
देश और प्रदेश में लुट रहा इंसान है
न्याय है रो रहा, चीखता हर विद्वान है
त्राहि-त्राहि मच रही हर नगर हर गली
मगर साहित्यकार को इससे है क्या पड़ी
कवि नजरबंद है और लेखनी उदास है
भारत धरा की जनता अब तो उदास है
सृजन भी आज उदास है और गमगीन है
कवि, कविधर्म छोड़ चाटुकारिता में तल्लीन है
लेखनी को त्यागकर सत्ता का वह दास है
जीवन वृत्त आज अवसरवादिता का संवाद है
ऐसे वह लोक धर्म कैसे निभा पाएगा
केवल सत्ता का प्रवक्ता वह कहलाएगा
कवि नजरबंद है और लेखनी निराश है।
-राकेशधर द्विवेदी