हर बयानी खलिशे-खार की तरह बयां होती
खल्वत मे सफे-मिज़गा के मोअजे -शरोदगी है खोलती
हनोज़ न मिल सका जवाब उन आँखों को
मेरी रुकाशी मे न जाने कैसे -कैसे मुज़मर के साथ है डोलती
मुश्ताक है सारी बातों को जानने के लिए
हर नाश-औ-नुमा बात के शर-हे को जिबस है तोलती
महवे रहती है दवाम मोअजे-ज़ार की कुल्फत मे
ऐ-'यासिर' खामोश होकर भी ये तेरी आँखें है बोलती
-श़ायर ज़नाब 'यासिर'
प्रस्तुतिः सिकंदर ख़ान
प्रस्तुतिः सिकंदर ख़ान
खार -- कांटे, खल्वत-- तन्हाई, मिज़गा -- जूनून
शर-हे -- मतलब, जिबस -- बहुत ज्यादा, दवाम -- लीन
