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Tuesday, May 30, 2017

कब किसे ऐतबार होता है.....सुशील यादव


कब किसे ऐतबार होता है
सात जन्म का प्यार होता है 

दिल की बस्ती रही उजड़ती सी 
सोलह उधर सिंगार होता है 

मनचले तो जहाँ - कहीं जाते 
शक़्ल दारोमदार होता है 

मानते हैं सभी, ख़ुदा होना 
काफ़िर का भी, संसार होता है 

किस कंधे की पड़े, हमें ज़रूरत 
कौन तब, तरफ़दार होता है
-सुशील यादव

(बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन 2122 1122 22 ### २१२२१२१२ २२)

Tuesday, October 18, 2016

सफ़र में.............सुशील यादव

तुम बाग़ लगाओ, तितलियाँ आएँगी
उजड़े गाँव नई बस्तियाँ आएँगी

जिन चेहरों सूखा, आँख में सन्नाटा
बादल बरसेंगे, बिजलियाँ आएँगी

दो चार क़दम जो, चल भी नहीं पाते
हिम्मत की नई, बैसाखियाँ आएँगी

उम्मीद की बंसी, बस डाले रखना
क़िस्मत की सब, मछलियाँ आएँगी

सफ़र में अकेले, हो तो मालूम रहे
तेरे सामने भी, दुश्वारियां आएँगी

नाकामी अंदाज़ में, कुछ नये छुपाओ
अख़बार छप के, सुर्खियाँ आएँगी

-सुशील यादव

Sunday, October 2, 2016

बस ख़्याले बुनता रहूँ............सुशील यादव



अँधेरे में दुआ करूँ, ऐ ख़ुदा परछाई दे
बेख़्याली में निकले, जो नाम सुनाई दे

करवट न बदलूँ, कोई ख़्वाब न देखूँ
नीद से उठते तेरी, याद जुम्हाई दे

क़समों का क़सीदा हो, कहीं वादों का हो ताना
ख़्याले बुनता रहूँ, बस यूँ तन्हाई दे

उजड़े गुलशन में, सब्ज़-शजर देखूँ
हो तब्दील क़िस्मत, जन्नत ख़ुदाई दे

रिश्तों की अदालत, बेजान हलफ़नामे
या मुझे ज़िंदा रख, या मेरी रिहाई दे

-सुशील यादव
sushil.yadav151@gmail.com

Saturday, March 26, 2016

बोलो किन यादों फिर, बग़ीचा लगाते हो.... सुशील यादव


रोने की हर बात पे कहकहा लगाते हो 
ज़ख़्मों पर जलता, क्यूँ फाहा लगाते हो 

गिर न जाए आकाश, से लौट के पत्थर 
अपने मक़सद का, निशाना लगाते हो 

हाथों हाथ बेचा करो, ईमान-धरम तुम 
सड़कों पे नुमाइश, तमाशा लगाते हो 

फूलो से रंज तुम्हें, ख़ुशबू से परहेज़ 
बोलो किन यादों फिर, बग़ीचा लगाते हो 

छन के आती रौशनी, बस उन झरोखों से 
संयम सुशील मन, से शीशा लगाते हो

- सुशील यादव

sushil.yadav151@gmail.com