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Tuesday, December 17, 2024

तुम्हारी पलकों की कोर पर ..... स्मृति आदित्य पाण्डेय ''फाल्गुनी''



कुछ मत कहना तुम
मैं जानती हूँ
मेरे जाने के बाद
वह जो तुम्हारी पलकों की कोर पर
रुका हुआ है
चमकीला मोती
टूटकर बिखर जाएगा
गालों पर
और तुम घंटों अपनी खिड़की से
दूर आकाश को निहारोगे
समेटना चाहोगे
पानी के पारदर्शी मोती को,
देर तक बसी रहेगी
तुम्हारी आँखों में
मेरी परेशान छवि
और फिर लिखोगे तुम कोई कविता
फाड़कर फेंक देने के लिए...
जब फेंकोगे उस
उस लिखी-अनलिखी
कविता की पुर्जियाँ,
तब नहीं गिरेगी वह
ऊपर से नीचे जमीन पर
बल्कि गिरेगी
तुम्हारी मन-धरा पर
बनकर काँच की किर्चियाँ...
चुभेगी देर तक तुम्हें
लॉन के गुलमोहर की नर्म पत्तियाँ। 


स्मृति आदित्य पाण्डेय ''फाल्गुनी''

(पुस्तक हथेलियों पर गुलाबी अक्षर पृष्ठः 82-83)


Thursday, September 10, 2015

लौट-लौट कर आएगा तुम्हारे पास..... स्मृति आदित्य








मन परिंदा है 
रूठता है 
उड़ता है 
उड़ता चला जाता है 
दूर..कहीं दूर 
फिर रूकता है 
ठहरता है, सोचता है, आकुल हो उठता है 
नहीं मानता 
और लौट आता है 
फिर... 
फिर उसी शाख पर 
जिस पर विश्वास के तिनकों से बुना 
हमारा घरौंदा है
मन परिंदा है 
लौट-लौट कर आएगा तुम्हारे पास 
तुम्हारे लिए...क्योंकि मन जिंदा है!

-स्मृति आदित्य

Wednesday, July 22, 2015

नहीं जानती क्यों................फाल्गुनी











नहीं जानती क्यों
अचानक सरसराती धूल के साथ
हमारे बीच
भर जाती है आंधियां
और हम शब्दहीन घास से
बस नम खड़े रह जाते हैं

नहीं जानती क्यों
अचानक बह आता है
हमारे बीच
दुखों का खारा पारदर्शी पानी
और हम अपने अपने संमदर की लहरों से उलझते
पास-पास होकर
भीग नहीं पाते...

नहीं जानती क्यों
हमारे बीच महकते सुकोमल गुलाबी फूल
अनकहे तीखे दर्द की मार से झरने लगते हैं और
उन्हें समेटने में मेरे प्रेम से सने ताजा शब्द
अचानक बेमौत मरने लगते हैं..
नहीं जानती क्यों.... 

--फाल्गुनी

Wednesday, July 1, 2015

नहीं जानती क्यों.....फाल्गुनी





नहीं जानती क्यों
अचानक सरसराती धूल के साथ
हमारे बीच
भर जाती है आंधियां
और हम शब्दहीन घास से
बस नम खड़े रह जाते हैं

नहीं जानती क्यों
अचानक बह आता है
हमारे बीच
दुखों का खारा पारदर्शी पानी
और हम अपने अपने संमदर की लहरों से उलझते
पास-पास होकर
भीग नहीं पाते...

नहीं जानती क्यों
हमारे बीच महकते सुकोमल गुलाबी फूल
अनकहे तीखे दर्द की मार से झरने लगते हैं और
उन्हें समेटने में मेरे प्रेम से सने ताजा शब्द
अचानक बेमौत मरने लगते हैं..
नहीं जानती क्यों.... 

--फाल्गुनी

Wednesday, June 24, 2015

प्यार इतना किया हमने................फाल्गुनी












ओस की हर बूंद को 
छू कर देखा था कई बार 
कच्चे प्यार की तरह 
विलीन हो गई, 

तुम होते गए श्वेत श्याम 
मुझे पा लेने के बाद 
पता नहीं क्यों मैं रंगीन हो गई

प्यार इतना किया हमने कि 
तुम दिन से रात हो गए 
और ना जाने कब मेरी रातें 
दिन हो गई...

-फाल्गुनी

Wednesday, July 30, 2014

यादों की किरचें ..................................फाल्गुनी
















दिल की कोमल धरा पर
धँसी हुई है
तुम्हारी यादों की किरचें
और
रिस रहा है उनसे
बीते वक्त का लहू,

कितना शहद था वह वक्त
जो आज तुम्हारी बेवफाई से
रक्त-सा लग रहा है।
तुम लौटकर आ सकते थे
मगर तुमने चाहा नहीं

मैं आगे बढ़ जाना चाहती थी
मगर ऐसा मुझसे हुआ नहीं।

तुम्हारी यादों की
बहुत बारीक किरचें है
दुखती हैं
पर निकल नहीं पाती

तुमने कहा तो कोशिश भी की।
किरचें दिल से निकलती हैं तो
अँगुलियों में लग जाती है

कहाँ आसान है
इन्हें निकाल पाना
निकल भी गई तो कहाँ जी पाऊँगी
तुम्हारी यादों के बिना। 
-फाल्गुनी

Tuesday, July 29, 2014

घबरा रही हूँ अन्तर्मन के शोर से..........फाल्गुनी






सहजता से कह दिया तुमने,
फाल्गुनी, मैं नहीं कर सकता तुमसे प्यार,
क्योंकि मैं डरता हूँ,
तुम्हारी आँखों की उजली भोर से..!

फिर कहा था यह भी कि
'वह' मैं कर चुका हूँ किसी और से...!

कभी अकेले में पूछना अपने मन के चोर से...
क्यों फिर हम आज भी बँधे हैं 

एक सुगंधित डोर से।

अतीत के गुलाबी पन्ने पढ़ना कभी गौर से,
तुम्हीं ने मेरे दिल को पुकारा था जोर से,

वह पल महका हुआ भेज रही हूँ आज इस छोर से,
ऊपर से शांत हूँ लेकिन घबरा रही हूँ अन्तर्मन के शोर से।

-फाल्गुनी

नहीं होता है सावन खुशगवार........फाल्गुनी

 




















नहीं दिखता तुम्हारी आँखों में
अब वो शहदीया राज


नहीं खिलता देखकर तुम्हें
मेरे मन का अमलतास,


नहीं गुदगुदाते तुम्हारी
सुरीली आँखों के कचनार


नहीं झरता मुझ पर अब
तुम्हारे नेह का हरसिंगार,


सेमल के कोमल फूलों से
नहीं करती माटी श्रृंगार


बहुत दिनों से उदास खड़ा है
आँगन का चंपा सदाबहार,


रिमझिम-रिमझिम बूँदों से
मन में नहीं उठती सौंधी बयार


रुनझुन-रुनझुन बरखा से

नहीं होता है सावन खुशगवार,

बीते दिन की कच्ची यादें
चुभती है बन कर शूल
मत आना साथी लौटकर
अब गई हूँ तुमको भूल।


-फाल्गुनी

Sunday, July 20, 2014

तुम्हारा भीना संदेश............फाल्गुनी



















जब सोचा था तुमने
दूर कहीं मेरे बारे में
यहाँ मेरे हाथों की चुड़ियाँ छनछनाई थी।


जब तोड़ा था मेरे लिए तुमने
अपनी क्यारी से पीला फूल
यहाँ मेरी जुल्फें लहराई थी।


जब महकी थी कोई कच्ची शाख
तुमसे लिपट कर
यहाँ मेरी चुनरी मुस्कुराई थी।


जब निहारा था तुमने उजला गोरा चाँद
यहाँ मेरे माथे की
नाजुक बिंदिया शर्माई थी।


जब उछाला था तुमने हवा में
अपना नशीला प्यार
यहाँ मेरे बदन में बिजली सरसराई थी।


तुम कहीं भी रहो और
कुछ भी करों मेरे लिए,
मेरी आत्मा ले आती है
तुम्हारा भीना संदेश
मेरे जीवन का बस यही है शेष।


-फाल्गुनी


Saturday, July 19, 2014

आज खुद को विश्वास दिला रहा हूँ..............फाल्गुनी























जब देखता हूँ मैं
तुम्हारे माथे पर
चमकती पसीने की बूँदें,


ओस झरती हैं
मेरे दिल की महकती क्यारी में,


जब देखता हूँ मैं
तुम्हें गोबर और पीली मिट्टी से
घर का आँगन लीपते हुए
मेरे मन के आँगन से सौंधी खुशबू उड़ती है,


जब बुनती हो तुम
ठिठुरती सर्दियों में कोई मफलर मेरे लिए
मेरे अंदर का मुस्कुराता प्यार
ख्वाब बुनता है तुम्हारे लिए।
कभी-कभी सोचता हूँ कि
काश,
तुम मेरे इन देखे-अनदेखे सपनों की
एक झलक भी देख पाती तो
शायद यूँ कुँवारा छोड़ मुझे
खुद कुँवारी ना रह जाती।


आज जब गर्मियों में
तुम्हारी यादों की कोयल का
कंठ बैठे जा रहा है
तुम्हारा हाथ
अमराई के तले
मेरे कान उमेठे जा रहा है।


फाल्गुनी,
तुम नहीं लौटोगी
ये मुझे पता है,
पता नहीं क्यों
आज खुद को विश्वास दिला रहा हूँ।
यह अनकही कविता तुमसे ही लिखवा रहा हूँ। 


-फाल्गुनी

Tuesday, July 15, 2014

हम दोनों नाराज है..................फाल्गुनी




 














दूरियों की
सघन काली घटाओं से
अचानक झाँक उठी
यादों की चमकीली चाँदनी
और मेरे उदास आँगन में
खिल उठी तुम्हारे प्यार की
नाजुक कुमुदनी,
कितनी देर तक
मैं अकेली महकती रही
नयन-दीप में
अश्रु-बाती सुलगती रही,

एक घना झुरमुट
कड़वे शब्दों का
अब भी हमारे साथ है
पर मुझसे लिपटी हुई
तुम्हारी रूमानी आवाज है।
और हमारे बीच पसरा है
यह झूठ कि
हम दोनों नाराज है। 


-फाल्गुनी

Friday, June 20, 2014

फिर मैंने सब कुछ हारा...............फाल्गुनी
















तुमने रखा मेरी गुलाबी हथेली पर
एक जलता हुआ शब्द-अंगारा
और कहा कि चीखना मत
बस यही सच है रिश्ता हमारा।

तुमने चाहा कि तुम्हारे शब्द की
जलती हुई चटकन को भूल
तुम्हें एक मुस्कान का शीतल छींटा दूँ
पर कैसे करती मैं वह,
जब हथेली में दर्द के हरे छाले
निकल आए।
और मेरे सुलगते सवालों के
तुम्हारे तीखे जवाब चलकर आए।

रिश्तों की दहलीज पर आज
फिर मैंने सब कुछ हारा,
बस, एक शब्द तुम्हारा
और खेल खत्म हुआ सारा। 


-फाल्गुनी

Wednesday, June 11, 2014

मन कहीं खोना चाहता है............फाल्गुनी














  

खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,



महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,

बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,


और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,

मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,
तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,


मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और
मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना। 


-फाल्गुनी

Tuesday, June 10, 2014

तुम्हारी यादें....................फाल्गुनी

 














जब-जब मानसून बरसा
उसके साथ बरसे तुम
तुम्हारी यादें
तुम्हारी बातें
और मेरी आँखें।

जब-जब मानसून बरसा
उसके साथ बरसा मेरा वजूद
भीगा मेरा मन
और बढ़ उठी तपन।

जब-जब मानसून बरसा
उसके साथ बरसी
तुम्हारी तीखी बातों की किरचें
मन में जहाँ-तहाँ उग आई
बिन मौसम की मिरचें।

मानसून नहीं बरसा है यह
इसके साथ, बस बरसे हो तुम
कैसे बरसता मानसून
जब मेरी मन-धरा से तुम हो गए हो गुम। 


-फाल्गुनी

Tuesday, April 15, 2014

प्यार मेरे लिए तुम.......................फाल्गुनी


प्यार, एक शब्द भर होता
तो पोंछ देती उसे
अपने जीवन के कागज से,


प्यार, होता अगर कोई पत्ता
झरा देती उसे
अपने मन की क्यारी से


प्यार, होता जो एक गीत,
भूल चुकी होती मैं उसे
कभी गुनगुनाकर,

मगर, सच तो यह है कि
प्यार तुम हो,
तुम!
और तुम्हें
ना अपने जीवन से पोंछ सकती हूं,
ना झरा सकती हूं
मन की क्यारी से,
ना भूल सकती हूँ
बस एक बार गुनगुनाकर,


क्योंकि ओ मेरे विश्वास,
प्यार मेरे लिए तुम हो साक्षात,
सदा आसपास,
बनकर एक प्यास। 


-फाल्गुनी 
(वेब दुनिया से)



Sunday, April 13, 2014

जब पुकारते हो तुम..............फाल्गुनी



इन्द्रधनुषी रंगों की बारिश
होने लगती है
जब पुकारते हो तुम
मुझे मेरे बिगड़े हुए
नाम से,

और नारंगी हो उठती है
अधपके सूरज की किरणें
जब तुम्हारी आँखों की चमक में
अटक जाता है मेरा चेहरा,

उलझ जाती है हवा
मेरे कत्थई बालों से
जब फिसलती है तुम्हारी अँगुलियाँ
सावन की साँवली घटाओं से।

तुम एक सुहाना मौसम हो मेरे लिए। 


-फाल्गुनी
( वेब दुनिया से)