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Sunday, March 10, 2019

खेल जिन्दगी का........आशीष दुबे

वैसे तो चाँद तारों से अपनी शनासाई है।
क्या करें किस्मत में लेकिन रात की स्याही है।

आइना थे और दोस्ती हो गयी एक संग से।
उसकी आदत की वजह चोट हमने खाई है।

रात की यूँ गोद में लेटे तो रहे रात भर।
कुछ बात थी या याद थी जो नींद नहीं आई है।

बाद तेरे रह गया कोई न जीने का सबब।
भीड़ या खल्वत कहीं भी सिर्फ अब तनहाई है।

काट कर चला गया और आज भी अंजान है ।
मुस्कराकर पूछता ये शाख क्यों मुरझाई है।

खेल जिंदगी का, या शतरंज की चाल हैं।
वक्त ने अपनी बिसात तकदीर पर बिछाई है।।

-आशीष दुबे 
इटावा उप्र

शानसाई -परिचय, संग- पत्थर 
सबब-कारण , खल्वत-अकेलापन