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Tuesday, August 21, 2018

आँखें....दिव्या माथुर

लो आसमान सी फैल उठीं नीली आँखें
लो उमड़ पड़ीं सागर सी वे भीगी आँखें

मेघश्याम सी घनी घनी कारी आँखें
मधुशाला सी भरी भरी भारी आँखें

एक भरे पैमाने सी छलकीं आँखें 
दिल मानो थम गया किंतु धड़कीं आँखें

ओस में डूबी झील सरीखी नम आँखें
जग का समेटे बैठी हैं ये ग़म आँखें

आँसू का पी एक घूँट, दीं मुस्का आँखें
ये इलाज कई मर्ज़ों का नुस्खा आँखें

शब भर पढ़ती रहीं किसी के ख़त आँखें
धंस बेज़ारी से गालों में गईं झट आँखें

ठिठक गईं जीवन का लगा ग्रहण आँखें
पलक हुआ मन और बनी धड़कन आँखें

जहाँ का दर्द समेटे थीं बोझिल आँखें
दूज के चाँद सी सिमट हुईं ओझल आँखें।
-दिव्या माथुर

Monday, November 14, 2016

लानत.........दिव्या माथुर














थोड़ा सा
छेड़ा भर था

रूठ गया
और न लौटा

लानत भेजी
तो भी न गया

तुझ से अच्छा
है ख़याल तेरा

दिव्या माथुर

लेखक परिचय

Friday, November 11, 2016

संबल........दिव्या माथुर


जाड़े की
ठिठुरन में
हुक्का ही
इक संबल था

आया आज
ख़याल तेरा
गरम मुलायम
कम्बल सा

-दिव्या माथुर

Friday, October 21, 2016

काश..............दिव्या माथुर













काश कि उस मनहूस सुबह
मैं सीढ़ी से गिर जाती
मेरी तीमारदारी में तुम्हें
दफ़्तर की देर हो जाती
हलका सा दिल का दौरा
या तुम्हें सुबह पड़ जाता
आराम करो पूरा ह्फ़्ता
डाक्टर साग्रह कह जाता
‘स्कूल छोड़कर आओ पापा’
रघु ही उस दिन ज़िद करता
लाडली तुम्हारी गोद में चढ़
गंदा कर देती सूट नया
सजधज के मेनका सी मैं
काश कि पाती तुम्हें रिझा
काश तुम्हारा मचलके दिल 
द्फ़्तर जाने को न करता
काश कि सूरज देर से उगता
काश अलारम न बजता
काश सुबह हम देर से उठते
काश ये घर न उजड़ता।

-दिव्या माथुर

Thursday, October 13, 2016

अन्त्येष्टि - कुछ भाव...............दिव्या माथुर

कफ़न
बर्फ़ के पैसे बचा
बेटा ले तो आया है
किंतु कब तक
ये धूपबत्ती संभाल पाएगी दुर्गंध
विधवा के मन में
चल रहा है ये द्वंद
सोच रहा है बेटा उधर
पिता के मृत शरीर पर 
यदि फटी धोती
डाली जा सकती
तो ख़रीद लाता वह 
माँ के लिए एक धोती सस्ती।


करवट
लंबी काली कार पर 
सजा दिए गये हैं
फूलों से लिखे संदेश
‘लव यू पापा’
‘मिस यू ग्रैंड डैड’
‘फ़ेयर दी वैल हब्बी’

शवपेटिका में लेटे
करवट बदल रहे हैं
वही दादा जो
जीवन भर
ग़ुलामी के विरुद्ध खटे।

कुट्टी 
काली टाई लगाये
दस वर्षीय पोता
माँ से ज़िद कर रहा है
शवपेटिका को खोलने की
भला उसके दादा 
इतनी देर कैसे चुप रह सकते हैं
काला रिबन और
नई काली फ्रॉक पहने
पिता की अँगुली थामें
सहमी सी चल रही है पोती
अपने दादा से उसने
कल ही तो कुट्टी की थी।

नुमाइश
काले क्रिस्प सूट पहने बेटे
मेहमानों की खातिर में लगे हैं
सिल्क की साड़ियाँ पहने बहुऐं
अपने चमकते हीरों की
नुमाइश में लगीं हैं
बिचका के मुँह 
किसी ने कहा
एक दिन के लिए
इतने महँगे हीरे लेने का क्या फ़ायदा
बहु ने खटाक से जवाब दिया
पर हीरे तो हर मौके पर
पहने जा सकते हैं।

शिष्टाचार
नई नवेली विधवा
पड़ौसिनों से घिरी बैठी है
काली सिल्क की
नई साड़ी में लिपटी 
असहज
‘कैसी हो?’
‘आल राइट?’
‘केम छो?’
के प्रश्नों के भँवर में
डूबती उबरती
‘हाँ’ में सिर हिलाती है तो
पाती है कि वह ज़िंदा है।

तेरहवीं
सफ़ेद और लाल शराब में
तैरते लोग अपनी अपनी 
चपर चपर में लगे हैं
तरह तरह के पकवान सजे हैं
‘अरे कोई मृतक को भी याद कर लो’
दिल्ली से आई ताईजी ने कहा

कँधे उचका कर 
लोग इधर उधर हो लिए
बहू ने लपक कर भरे दिये में
कुछ और घी डाल दिया
बेटे ने जगजीत सिंह के भजनों की
टेप लगा दी।

-दिव्या माथुर
DivyaMathur@aol.com