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Tuesday, January 14, 2020

हवा रो रही है ...दिव्या भसीन

सिसकती है डाली हवा रो रही है।
कली अधखिली फिर से रौंदी गई है।।

फ़िज़ा में उदासी घुली इस तरह अब,
जुबां सिल गयी आँख में भी नमी है।

मेरी ख़ैर ख़्वाही का दावा था करता,
तबाही मेरी देख लब पर हँसी है।

हुए तन्हा हम ज़िन्दगी के सफ़र में,
लगे अपनी सूरत ही अब अजनबी है।

यकीं है मुझे जिसकी रहमत पे हरदम,
उसे चारसू ही नज़र ढूंढती है।

उसे रात के क्या अँधेरे डरायें,
जो ताउम्र ख़ुद तीरगी में पली है।

नसीबा करो बंद अब आज़माना
ख़बर भी है क्या मेरी जां पर बनी है।
-दिव्या भसीन

Monday, November 18, 2019

पता ...(गुड्डू) दिव्या कुमारी

"गुम हो कहीं ?" पूछा किसी ने
क्या पता है तुझे अपना पता?
क्यों कोई नहीं जानता मुझे इस दुनिया में
क्या कोई नहीं है मेरा अपना!!

भूल गई हूँ अपना पता,
रोज़ मेरा पता बदलता है।
पहले माँ का घर पे थी टेहरी
वही था मेरा पता तब।

तब आयी मेरे साथी की बारी
सफ़र था कोई जिसमें
उसका साथ था ज़रूरी
चली मैं उसके साथ,
फिर बदल गया मेरा पता तब।

फिर थी मेरे अंशों की बारी,
कहाँ, रखेंगे हम तुम्हारा ख़्याल,
बस बदल दो अपना पता,
फिर मेरा पता बदल गया।

मैं किस पते को अपना कहूँ?
जब पूछे मुझसे मेरा पता
मैं कौन-सा पता बताऊँ,
जो मैं आपने घर पहुंच जाऊँ।

मेरा पता कोई मुझे बता दे,
बस एक ऐसा पता जो हमेशा मेरा रहे
जिसे मैं बता सकूँ अपना पता
बस एक ऐसा पता जो हमेशा रहे मेरा।
-(गुड्डू) दिव्या कुमारी


Sunday, November 17, 2019

मां .....विभूति गोण्डवी

कैसे लिखूं,
मां पर,
निःशब्द हो जाता हूं मैं,
ज्ञान शून्य हो जाता हूं मैं ।

कैसे लिखूं,
मां पर,
कोई शब्द ही नही,
जो मां को परिभाषित कर सके ।

कैसे लिखूं,
मां पर,
मां के त्याग को,
कैसे कोई परिभाषित कर सकता है ।

कैसे लिखूं,
मां पर,
मां के दर्द को,
कैसे कोई परिभाषित कर सकता है ।

मां वो कल्पवृक्ष  है,
जिसकी छांव में ही ये जीवन गुलज़ार है,
नहीं तो ये जीवन,
बेजान है ।
-विभूति गोण्डवी

Friday, November 15, 2019

मैं पहले ही राख हूँ जलता नहीं हूँ ....अमित मिश्रा 'मौन'

मैं गुलों के जैसा महकता नहीं हूँ।
सितारा हूँ लेकिन चमकता नहीं हूँ।।

ज़माना ये समझे कि खोटा हूँ सिक्का,
बाज़ारों में इनकी मैं चलता नहीं हूँ।

यूँ  तो अंधेरों से जिगरी है यारी,
मैं ऐसा हूँ सूरज कि ढलता नहीं हूँ।

सफ़र पे जो निकला तो मंज़िल ज़रूरी,
यूँ राहों में ऐसे  मैं रुकता नहीं  हूँ।

उम्मीद-ए-वफ़ा  ने है तोड़ा  मुझे भी,
मैं आशिक़ के जैसा तड़पता नहीं हूँ।

कोशिश में ज़ालिम की कमी नहीं थी,
मैं पहले ही राख हूँ जलता नहीं  हूँ।

मयखानों की रौनक है शायद मुझी से,
मैं कितना भी पी लूँ बहकता नहीं हूँ।

सूरत से ज़्यादा  मैं  सीरत  को चाहूँ,
रुख़सारों पे चिकने फिसलता नहीं हूँ।

मुसीबत से अक़्सर कुश्ती हूँ करता,
है लोहा बदन मेरा थकता नहीं हूँ।

मिट्टी का बना हूँ ज़मीं से जुड़ा हूँ,
खुले आसमानों में उड़ता नहीं हूँ।

हुनर पार करने का सीखा है मैंने,
बीच भँवर अब मैं फंसता नहीं हूँ।

'मौन' भला  हूँ ना छेड़ो मुझे तुम,
मैं यूँ ही किसी के मुँह लगता नहीं हूँ।
- अमित मिश्रा 'मौन'

Thursday, November 14, 2019

एक बार पा तो लूँ, उसे ....रत्ना सिन्हा

मंज़िलों को पाने का मज़ा भी तभी है
जब तक वो ना मिले;
मिल जाये वो अगर तो लगता है
जैसे ख़्वाब कोई हक़ीक़त बन गए।
और, ना मिले वो अगर तो लगता है
जैसे ज़मीन-आसमां सब इक कर दूँ।
चाँद-सितारे भी तोड़ डालूँ, पर
एक बार पा तो लूँ, उसे।

चाहे जैसा भी हो वो, हर उपाए कर लूँ,
मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरूद्वारे के चक्कर भी ,
चाहे जितनी बार हो सके लगा लूँ।
पंडित-ज्योतिष-फ़क़ीर ने तो, न जाने
कितनी बार हाथों की लकीरें भी पढ़ी हो;
उसे पाने की चाह इतनी प्रबल हो जाती
कुछ भी कर गुज़रने को जी चाहता, बस
एक बार पा तो लूँ, उसे।

उसे पाने की कोई कसर बाकी न रह जाए,
ऐसी चाहत मात्र से ही हिम्मत और हौसले भी
सिर चढ़ कर बोलने लग जाते हैं जब,
तुन्हें न पाने की भी कोई गुंजाइश ही नहीं तब
हर वो मुसीबत मोल ली, बस
एक बार उसे पाने की जिद्द् ने
फिर, कितने जंग लड़े हो जैसे
पाकर मंज़िल भी धन्य हो गए वैसे!
-रत्ना सिन्हा